Chapter 2 Verses 48

Yogasthah kuru karmaani sangam tyaktwaa dhananjaya;
Siddhyasiddhyoh samo bhootwaa samatwam yoga uchyate.

48. Perform action, O Arjuna, being steadfast in Yoga, abandoning attachment and balanced in success and failure! Evenness of mind is called Yoga.

योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्तवा धनंजय।

सिद्धयसिद्धयोः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते।।48।।

हे धनंजय ! तू आसक्ति को त्याग कर तथा सिद्धि और असिद्धि में समान बुद्धिवाला होकर योग में स्थित हुआ कर्तव्यकर्मों को कर, समत्वभाव ही योग कहलाता है | (48)

Chapter 2 Verses 41

Vyavasaayaatmikaa buddhir ekeha kurunandana;
Bahushaakhaa hyanantaashcha buddhayo’vyavasaayinaam.

41. Here, O joy of the Kurus, there is a single one-pointed determination! Many-branched and endless are the thoughts of the irresolute.

व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन।

बहुशाखा ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम्।।41।।

हे अर्जुन ! इस कर्मयोग में निश्चयात्मिका बुद्धि एक ही होती है, किन्तु अस्थिर विचार वाले विवेकहीन सकाम मनुष्यों की बुद्धियाँ निश्चय ही बहुत भेदोंवाली और अनन्त होती हैं |(41)

 

 

 

Gita Chapter 18 : Mahatmya Story

Parvati said “My dear husband, you have told me the glories of the Seventeenth Chapter of the Srimad Bhagavad-gita, now kindly relate the glories of the Eighteenth Chapter of Srimad Bhagavad-gita.

Lord Shiva said; “Oh daughter of the Himalayas (Parvati), please listen to the glories of the Eighteenth Chapter of Srimad Bhagavad-Gita, which is higher than the Vedas and the giver of unlimited bliss. When it enters into one’s ears it destroys all material desires. For the pure devotee, it is divine nectar, it is Lord Vishnu’s very life and it is a solace to the hearts of Lord Indra and the demigods as well as the great yogis headed by Sanaka and Sananda.

One who recites it sends the messengers of Yamaraja far away. There is no other recitation, which can so quickly destroy all sin and free one from the threefold miseries of this world. Now listen with great devotion.

On the topmost peak of Mount Meru is Amaravati, which was built by Visvakarma. In [hat heavenly kingdom, Lord Indra along with his wife Saci is served by the demigods. One day while Lord Indra was sitting peacefully, he saw that one very beautiful person had arrived there, whom the servants of Lord Vishnu were serving. When. Lord Indra saw that beautiful young person; he immediately fell from his throne unto the ground. At that time those demigod who had been worshipping Indra picked up the crown that he was wearing and placed it on the head of that new beautiful person. After that, all the demigods and other denizens of the heavenly planets started to perform arati and sing wonderful songs to that new King Indra. The great rishis came there and offered their blessings and chanted Vedic mantras and the Gandharvas and Apsaras started to sing and dance joyfully. In this way, the new Indra, who had not performed the usual one hundred horse sacrifices, started to enjoy hundreds of different types of services rendered by the demigods and other denizens of the heavenly planets. When the old Indra saw this he became very surprised.

He started to think to himself, “This person here has never built wells or dug kunds or planted trees for the welfare of others, and when there were droughts, he did not provide grains in charity. He never performed any fire-sacrifices or great charities in the holy places. So how has he managed to attain my seat?” The old Indra, feeling greatly disturbed in his mind, left to the ocean of milk to pray to Lord Vishnu. When he managed to obtain darshan of Lord Vishnu, he asked Him “My dear Lord Vishnu, in the past I performed many sacrifices and other pious activities, for which I was installed as the Lord of heaven. But at this time another person has come there and taken my place as the king of heaven. This person in his life never performed any great, wonderful pious activities, nor had he performed any great Vedic sacrifices. So, how is it possible that he has managed to obtain my throne?”

At that time Lord Vishnu said, “My dear Indra, That great soul has performed the recitation daily of the Eighteenth Chapter of the Srimad Bhagavad-gita. Everyday during his life, he recited five Shlokas from this Chapter, and because of that activity he has attained the results of all sorts of pious activities and yajnas and after enjoying for many years as the king of heaven, he will attain My personal abode. If you perform the same activity of reciting the Eighteenth Chapter of Srimad Bhagavad-gita, you can also attain My divine abode.”

After hearing Lord Vishnu’s words, Lord Indra took the form of a brahmana and went to the bank of the Godavari River, where he saw the town of Kalegrani, which is very sacred. At that place, the Supreme Lord in His form known as Kalesva, resides. Close to this town, on the bank of the Godavari river, one very pure brahmana was sitting, who was very merciful and had understood the topmost goal and secret of the Vedic literatures. Daily he would sit at that spot and recite Shlokas of the Eighteenth Chapter of Srimad Bhagavad-gita. When Lord Indra saw him he became very happy. He immediately fell at his lotus-feet and requested him to teach him the Eighteenth Chapter of Srimad Bhagavad-gita. After Lord Indra had practiced the recitation, of the Eighteenth Chapter of Srimad Bhagavad-gita for sometime he managed to attain the topmost place of Vishnuloka. When he attained that place, he realized that the pleasure he had enjoyed as King Indra, along with the demigods, was nothing in comparison.

My dear Parvati, for this reason, the great sages, especially chant this Eighteenth Chapter of Srimad Bhagavad-gita and by so doing very quickly attain the lotus-feet of Lord Vishnu.

Anyone who hears or studies this Gita Mahatmya very quickly destroys all sins, which he has accumulated. And that person, who remembers this discourse with great faith attains the results of all kinds of pious activities and great sacrifices, and after enjoying all worldly opulence, attains the abode of Lord Vishnu.

अठारहवें अध्याय का माहात्म्य

श्रीपार्वतीजी ने कहाः भगवन् ! आपने सत्रहवें अध्याय का माहात्म्य बतलाया। अब अठारहवें अध्याय के माहात्म्य का वर्णन कीजिए।

श्रीमहादेवजी कहाः गिरिनन्दिनी ! चिन्मय आनन्द की धारा बहाने वाले अठारहवें अध्याय के पावन माहात्म्य को जो वेद से भी उत्तम है, श्रवण करो। वह सम्पूर्ण शास्त्रों का सर्वस्व, कानों में पड़ा हुआ रसायन के समान तथा संसार के यातनाजाल को छिन्नभिन्न करने वाला है। सिद्ध पुरुषों के लिए यह परम रहस्य की वस्तु है। इसमें अविद्या का नाश करने की पूर्ण क्षमता है। यह भगवान विष्णु की चेतना तथा सर्वश्रेष्ठ परम पद है। इतना ही नहीं, यह विवेकमयी लता का मूल, कामक्रोध और मद को नष्ट करने वाला, इन्द्र आदि देवताओं के चित्त का विश्राममन्दिर तथा सनकसनन्दन आदि महायोगियों का मनोरंजन करने वाला है। इसके पाठमात्र से यमदूतों की गर्जना बन्द हो जाती है। पार्वती ! इससे बढ़कर कोई ऐसा रहस्यमय उपदेश नहीं है, जो संतप्त मानवों के त्रिविध ताप को हरने वाला और बड़ेबड़े पातकों का नाश करने वाला हो। अठारहवें अध्याय का लोकोत्तर माहात्म्य है। इसके सम्बन्ध में जो पवित्र उपाख्यान है, उसे भक्तिपूर्वक सुनो। उसके श्रवणमात्र से जीव समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।

मेरुगिरि के शिखर अमरावती नामवाली एक रमणीय पुरी है। उसे पूर्वकाल में विश्वकर्मा ने बनाया था। उस पुरी में देवताओं द्वारा सेवित इन्द्र शची के साथ निवास करते थे। एक दिन वे सुखपूर्वक बैठे हुए थे, इतने ही में उन्होंने देखा कि भगवान विष्णु के दूतों से सेवित एक अन्य पुरुष वहाँ रहा है। इन्द्र उस नवागत पुरुष के तेज से तिरस्कृत होकर तुरन्त ही अपने मणिमय सिंहासन से मण्डप में गिर पड़े। तब इन्द्र के सेवकों ने देवलोक के साम्राज्य का मुकुट इस नूतन इन्द्र के मस्तक पर रख दिया। फिर तो दिव्य गीत गाती हुई देवांगनाओं के साथ सब देवता उनकी आरती उतारने लगे। ऋषियों ने वेदमंत्रों का उच्चारण करके  उन्हें अनेक आशीर्वाद दिये। गन्धर्वों का ललित स्वर में मंगलमय गान होने लगा।

इस प्रकार इस नवीन इन्द्र का सौ यज्ञों का अनुष्ठान किये बिना ही नाना प्रकार के उत्सवों से सेवित देखकर पुराने इन्द्र को बड़ा विस्मय हुआ। वे सोचने लगेःइसने तो मार्ग में कभी पौंसले (प्याऊ) बनवाये हैं, पोखरे खुदवाये है और पथिकों को विश्राम देने वाले बड़ेबड़े वृक्ष ही लगवाये है। अकाल पड़ने पर अन्न दान के द्वारा इसने प्राणियों का सत्कार भी नहीं किया है। इसके द्वारा तीर्थों में सत्र और गाँवों में यज्ञ का अनुष्ठान भी नहीं हुआ है। फिर इसने यहाँ भाग्य की दी हुई ये सारी वस्तुएँ कैसे प्राप्त की हैं? इस चिन्ता से व्याकुल होकर इन्द्र भगवान विष्णु से पूछने के लिए प्रेमपूर्वक क्षीरसागर के तट पर गये और वहाँ अकस्मात अपने साम्राज्य से भ्रष्ट होने का दुःख निवेदन करते हुए बोलेः

लक्ष्मीकान्त ! मैंने पूर्वकाल में आपकी प्रसन्नता के लिए सौ यज्ञों का अनुष्ठान किया था। उसी के पुण्य से मुझे इन्द्रपद की प्राप्ति हुई थी, किन्तु इस समय स्वर्ग में कोई दूसरा ही इन्द्र अधिकार जमाये बैठा है। उसने तो कभी धर्म का अनुष्ठान किया है यज्ञों का फिर उसने मेरे दिव्य सिंहासन पर कैसे अधिकार जमाया है?’

श्रीभगवान बोलेः इन्द्र ! वह गीता के अठारहवें अध्याय में से पाँच श्लोकों का प्रतिदिन पाठ करता है। उसी के पुण्य से उसने तुम्हारे उत्तम साम्राज्य को प्राप्त कर लिया है। गीता के अठारहवें अध्याय का पाठ सब पुण्यों का शिरोमणि है। उसी का आश्रय लेकर तुम भी पद पर स्थिर हो सकते हो।

भगवान विष्णु के ये वचन सुनकर और उस उत्तम उपाय को जानकर इन्द्र ब्राह्मण का वेष बनाये गोदावरी के तट पर गये। वहाँ उन्होंने कालिकाग्राम नामक उत्तम और पवित्र नगर देखा, जहाँ काल का भी मर्दन करने वाले भगवान कालेश्वर विराजमान हैं। वही गोदावर तट पर एक परम धर्मात्मा ब्राह्मण बैठे थे, जो बड़े ही दयालु और वेदों के पारंगत विद्वान थे। वे अपने मन को वश में करके प्रतिदिन गीता के अठारहवें अध्याय का स्वाध्याय किया करते थे। उन्हें देखकर इन्द्र ने बड़ी प्रसन्नता के साथ उनके दोनों चरणों में मस्तक झुकाया और उन्हीं अठारहवें अध्याय को पढ़ा। फिर उसी के पुण्य से उन्होंने श्री विष्णु का सायुज्य प्राप्त कर लिया। इन्द्र आदि देवताओं का पद बहुत ही छोटा है, यह जानकर वे परम हर्ष के साथ उत्तम वैकुण्ठधाम को गये। अतः यह अध्याय मुनियों के लिए श्रेष्ठ परम तत्त्व है। पार्वती ! अठारहवे अध्याय के इस दिव्य माहात्म्य का वर्णन समाप्त हुआ। इसके श्रवण मात्र से मनुष्य सब पापों से छुटकारा पा जाता है। इस प्रकार सम्पूर्ण गीता का पापनाशक माहात्म्य बतलाया गया। महाभागे ! जो पुरुष श्रद्धायुक्त होकर इसका श्रवण करता है, वह समस्त यज्ञों का फल पाकर अन्त में श्रीविष्णु का सायुज्य प्राप्त कर लेता है।

Gita Chapter 17 : Mahatmya Story

Lord Shiva said, “My dear Parvati, you have heard the unlimited glories of the Sixteenth Chapter of Srimad Bhagavad-gita. Now, kindly hear the nectarine glories of the Seventeenth Chapter of Srimad Bhagavad-gita.

King Khadgabahu’s son had a servant by the name of Dushasan who was very crafty and exceptionally foolish. Dushasan made a bet with the prince that he could ride the elephant, at which time he jumped upon the elephant and after going a few steps, the people there started requesting him, not to ride that dangerous elephant. But foolish Dushasan started to prod that elephant and used strong words to urge him on. Suddenly, that elephant became very angry and started to run wildly here and there. Unable to hold on, Dushasan fell to the ground. The elephant stomped on him and Dushasan died. After that he attained the body of an elephant in Simhaldwip, where he stayed in the king’s palace.

The king of Simhaldwip was a close friend of King Khadgabahu. One day the king of Simhaldwip decided to send that elephant as a present to his friend, King Khadgabahu, who in turn presented that elephant to one poet, who pleased him with his beautiful poetry.

Thereafter, that poet sold that elephant for one hundred gold coins to the king of Malva. After some time, that elephant contracted a terminal disease. When the elephant-keepers saw that the elephant had stopped eating and drinking, they reported the matter to the king. When the king found out, he went to the place of the elephant, along with the best of doctors. At that time, to the surprise of that king, the elephant started to speak, “My dear king you are very pious, and a strict follower of the Vedas. You always worship the lotus feet of Lord Vishnu. So you should know, that at this time, these medicines and doctors will be of no use. Neither any kind of charity of sacrifice will help at the time of death. If you care for me and want to help me, then bring someone, who daily recites the Seventeenth Chapter of Srimad Bhagavad-gita.”

As requested by that elephant, the king brought one great devotee, who regularly recited the Seventeenth Chapter of the Srimad Bhagavad-gita. That devotee, while chanting the Seventeenth Chapter, sprinkled water on the elephant at which time he gave up his elephant body and attained a four-armed form, similar to that of Lord Vishnu. He immediately sat down in a flower airplane, which had been sent to take him to Vaikuntha. While sitting in that airplane, the king inquired from him about his previous birth, and Dushasan, after telling him everything, left for Vaikuntha. After which, that best of men, the king of Malva, started regularly reciting the Seventeenth Chapter of Srimad Bhagavad-gita. After a short time he attained the lotus feet of Lord Krishna.

सत्रहवें अध्याय का माहात्म्य

श्रीमहादेवजी कहते हैंपार्वती ! सोलहवें अध्याय का माहात्म्य बतलाया गया। अब सत्रहवें अध्याय की अनन्त महिमा श्रवण करो। राजा खड्गबाहू के पुत्र का दुःशासन नाम का एक नौकर था। वह बहुत खोटी बुद्धि का मनुष्य था। एक बार वह माण्डलीक राजकुमारों के साथ बहुत धन  बाजी लगाकर हाथी पर चढ़ा और कुछ ही कदम आगे जाने पर लोगों के मना करने पर भी वह मूढ हाथी के प्रति जोरजोर से कठोर शब्द करने लगा। उसकी आवाज सुनकर हाथी क्रोध से अंधा हो गया और दुःशासन पैर फिसल जाने के कारण पृथ्वी पर गिर पड़ा। दुःशासन को गिरकर कुछकुछ उच्छवास लेते देख काल के समान निरंकुश हाथी ने क्रोध से भरकर उसे ऊपर फेंक दिया। ऊपर से गिरते ही उसके प्राण निकल गये। इस प्रकार कालवश मृत्यु को प्राप्त  होने के बाद उसे हाथी की योनि मिली और सिंहलद्वीप के महाराज के यहाँ उसने अपना बहुत समय व्यतीत किया।

सिंहलद्वीप के राजा की महाराज खड्गबाहु से बड़ी मैत्री थी, अतः उन्होंने जल के मार्ग से उस हाथी को मित्र की प्रसन्नता के लिए भेज दिया। एक दिन राजा ने श्लोक की सम्सयापूर्ति से संतुष्ट होकर किसी कवि को पुरस्काररूप में वह हाथी दे दिया और उन्होंने सौ स्वर्णमुद्राएँ लेकर मालवनरेश के हाथ बेच दिया। कुछ काल व्यतीत होने पर वह हाथी यत्नपूर्वक पालित होने पर भी असाध्य ज्वर से ग्रस्त होकर मरणासन्न हो गया। हाथीवानों ने जब उसे ऐसी शोचनीय अवस्था में देखा तो राजा के पास जाकर हाथी के हित के लिए शीघ्र ही सारा हाल कह सुनायाःमहाराज ! आपका हाथी अस्वस्थ जान पड़ता है। उसका खाना, पीना और सोना सब छूट गाया है। हमारी समझ में नहीं आता इसका क्या कारण है।

हाथीवानों का बताया हुआ समाचार सुनकर राजा ने हाथी के रोग को पहचान वाले चिकित्साकुशल मंत्रियों के साथ उस स्थान पर पदार्पण किया, जहाँ हाथी ज्वरग्रस्त होकर पड़ा था। राजा को देखते ही उसने ज्वरजनित वेदना को भूलकर संसार को आश्चर्य में डालने वाली वाणी में कहाः सम्पूर्ण शास्त्रों के ज्ञाता, राजनीति के समुद्र, शत्रुसमुदाय को परास्त करने वाले तथा भगवान विष्णु के चरणों में अनुराग रखनेवाले महाराज ! इन औषधियों से क्या लेना है? वैद्यों से भी कुछ लाभ होने वाला नहीं है, दान ओर जप भी क्या सिद्ध होगा? आप कृपा करके गीता के सत्रहवें अध्याय का पाठ करने वाले किसी ब्राह्मण को बुलवाइये।

हाथी के कथनानुसार राजा ने सब कुछ वैसा ही किया। तदनन्तर गीतापाठ करने वाले ब्राह्मण ने जब उत्तम जल को अभिमंत्रित करके उसके ऊपर डाला, तब दुःशासन गजयोनि का परित्याग करके मुक्त हो गया। राजा ने दुःशासन को दिव्य विमान पर आरूढ तथा इन्द्र के समान तेजस्वी देखकर पूछाःपूर्वजन्म में तुम्हारी क्या जाति थी? क्या स्वरूप था? कैसे आचरण थे? और किस कर्म से तुम यहाँ हाथी होकर आये थे? ये सारी बातें मुझे बताओ।

 राजा के इस प्रकार पूछने पर संकट से छूटे हुए दुःशासन ने विमान पर बैठेहीबैठे स्थिरता के साथ अपना पूर्वजन्म का उपर्युक्त समाचार यथावत कह सुनाया। तत्पश्चात् नरश्रेष्ठ मालवनरेश ने भी गीता के सत्रहवें अध्याय  पाठ करने लगे। इससे थोड़े ही समय में उनकी मुक्ति हो गयी।

Gita Chapter 16 : Mahatmya Story

Lord Shiva said, “My dear Parvati, I will now tell you the glories of the Sixteenth Chapter of Srimad Bhagavad-gita.

In Gujarat, there is a town of the name Saurashtra (Surat). King Khadgabahu had his kingdom there, where he lived just like another Indra, king of heaven. He kept a very passionate male elephant of the name Arimardana from whose temples liquid oozed due to his pride. One day that elephant, in a fit of anger, broke loose from his chains and started to destroy the elephant shed, after which he began running here and there, wildly chasing the citizens. Everyone fled as fast as possible. The elephant keepers immediately reported the news to the king and when the king heard, he went along with his son to the place, where the mad elephant was. King Khadgabahu knew the art of controlling wild elephants. When the king reached the spot, where the elephant was running amok, he saw that many persons had been trampled and others were running here and there to avoid that elephant.

Just then, as the king was watching that chaotic scene, he saw one brahmana peacefully returning from taking his bath in the lake. That brahmana was silently reciting the first three Shlokas from the Sixteenth Chapter of Srimad Bhagavad-gita, which start with the word; abhayam (fearlessness). When the people saw that brahmana walking towards the elephant, they tried to tell him not to go near him, but that brahmana did not lake any notice of them and walked straight up to that mad elephant and started to stroke him. When the elephant saw the Brahmana approaching, he immediately lost all anger and lay down peacefully.

After that brahmana had patted the elephant for a few moments, he went peacefully on his way. When the king and all the citizens saw these amazing incidents, they were astonished. The king immediately went and fell at the feet of that brahmana and inquired from him, “what austerities and worship have you performed to attain such peacefulness and amazing powers?” The brahmana replied; “Daily I am reciting some Shlokas from the sixteenth Chapter of the Srimad Bhagavad-gita.”

Lord Shiva said; “That king requested the brahmana to come to the palace, where he offered to him in charity, one hundred gold coins and requested that pious brahmana to instruct him in the chanting of those verses from the Sixteenth Chapter of the Srimad Bhagavad-gita

After King Khadgabahu had been chanting those verses for some time, he one day along with his guards went to the place where that mad elephant was kept and ordered the elephant keepers to release him. At that, the citizens became upset with the king thinking that the elephant would begin to run amok again. The king went before that mad elephant, which immediately lay down and he started to stroke him. After that the king returned to his palace and installed his son on the throne and left for the forest, where he worshipped Lord Krishna by chanting those Shlokas from the Sixteenth Chapter of Srimad Bhagavad-gita and very quickly he attained the lotus-feet of Lord Krishna.

Anyone who chants the Sixteenth Chapter of the Srimad Bhagavad-gita, however sinful he is, very quickly attains the same goal as King Khadgabahu, the lotus-feet of Lord Krishna.

सोलहवें अध्याय का माहात्म्य

श्रीमहादेवजी कहते हैं- पार्वती ! अब मैं गीता के सोलहवें अध्याय का माहात्म्य बताऊँगा, सुनो। गुजरात में सौराष्ट्र नामक एक नगर है। वहाँ खड्गबाहु नाम के राजा राज्य करते थे, जो दूसरे इन्द्र के समान प्रतापी थे। उनका एक हाथी था, जो मद बहाया करता था और सदा मद से उन्मत्त रहता था। उस हाथी का नाम अरिमर्दन था।

एक दिन रात में वह हठात साँकलों और लोहे के खम्भों को तोड़-फोड़कर बाहर निकला। हाथीवान उसके दोनों ओर अंकुश लेकर डरा रहे थे, किन्तु क्रोधवश उन सबकी अवहेलना करके उसने अपने रहने के स्थान- हथिसार को गिरा दिया। उस पर चारों ओर से भालों की मार पड़ रही थी फिर भी हाथीवान ही डरे हुए थे, हाथी को तनिक भी भय नहीं होता था। इस कौतूहलपूर्ण घटना को सुनकर राजा स्वयं हाथी को मनाने की कला में निपुण राजकुमारों के साथ वहाँ आये। आकर उन्होंने उस बलवान दँतैले हाथी को देखा। नगर के निवासी अन्य काम धंधों की चिन्ता छोड़ अपने बालकों को भय से बचाते हुए बहुत दूर खड़े होकर उस महाभयंकर गजराज को देखते रहे। इसी समय कोई ब्राह्मण तालाब से नहाकर उसी मार्ग से लौटे। वे गीता के सोलहवें अध्याय के अभयम् आदि कुछ श्लोकों का जप कर रहे थे। पुरवासियों और पीलवानों (महावतों) ने बहुत मना किया, किन्तु किसी की न मानी। उन्हें हाथी से भय नहीं था, इसलिए वे चिन्तित नहीं हुए। उधर हाथी अपनी चिंघाड़ से चारों दिशाओं को व्याप्त करता हुआ लोगों को कुचल रहा था। वे ब्राह्मण उसके बहते हुए मद को हाथ से छूकर कुशलपूर्वक (निर्भयता से) निकल गये। इससे वहाँ राजा तथा देखने वाले पुरवासियों के मन मे इतना विस्मय हुआ कि उसका वर्णन नहीं हो सकता। राजा के कमलनेत्र चकित हो उठे थे। उन्होंने ब्राह्मण को बुला सवारी से उतरकर उन्हें प्रणाम किया और पूछाः ब्राह्मण ! आज आपने यह महान अलौकिक कार्य किया है, क्योंकि इस काल के समान भयंकर गजराज के सामने से आप सकुशल लौट आये हैं। प्रभो ! आप किस देवता का पूजन तथा किस मन्त्र का जप करते हैं? बताइये, आपने कौन-सी सिद्धि प्राप्त की है?

ब्राह्मण ने कहाः राजन ! मैं प्रतिदिन गीता के सोलहवें अध्याय के कुछ श्लोकों का जप किया करता हूँ, इसी से सारी सिद्धियाँ प्राप्त हुई हैं।

श्रीमहादेवजी कहते हैं- तब हाथी का कौतूहल देखने की इच्छा छोड़कर राजा ब्राह्मण देवता को साथ ले अपने महल में आये। वहाँ शुभ मुहूर्त देखकर एक लाख स्वर्णमुद्राओं की दक्षिणा दे उन्होंने ब्राह्मण को संतुष्ट किया और उनसे गीता-मंत्र की दीक्षा ली। गीता के सोलहवें अध्याय के अभयम् आदि कुछ श्लोकों का अभ्यास कर लेने के बाद उनके मन में हाथी को छोड़कर उसके कौतुक देखने की इच्छा जागृत हुई, फिर तो एक दिन सैनिकों के साथ बाहर निकलकर राजा ने हाथीवानों से उसी मत्त गजराज का बन्धन खुलवाया। वे निर्भय हो गये। राज्य का सुख-विलास के प्रति आदर का भाव नहीं रहा। वे अपना जीवन तृणवत् समझकर हाथी के सामने चले गये। साहसी मनुष्यों में अग्रगण्य राजा खड्गबाहु मन्त्र पर विश्वास करके हाथी के समीप गये और मद की अनवरत धारा बहाते हुए उसके गण्डस्थल को हाथ से छूकर सकुशल लौट आये। काल के मुख से धार्मिक और खल के मुख से साधु पुरुष की भाँति राजा उस गजराज के मुख से बचकर निकल आये। नगर में आने पर उन्होंने अपने राजकुमार को राज्य पर अभिषिक्त कर दिया तथा स्वयं गीता के सोलहवें अध्याय का पाठ करके परम गति प्राप्त की |

Gita Chapter 15 : Mahatmya Story

Lord Shiva said, “My dear Parvati, now I will tell you the glories of the Fifteenth Chapter of the Srimad Bhagavad-gita, kindly listen carefully.

In Gaudadesa, there was a king of the name Narasingha. He was so powerful that he was able to defeat the demigods. The commander of his army was known by the name Sarabhmerund. He was very greedy and along with the prince, he planned to kill the king, and become the ruler of Gaudadesa. But before he was able to carry out his plan, he got cholera and very quickly died. After he took his next birth as a horse in the country known as Sindhu. That horse was very beautiful and was very fast at running. He had all the qualities of a prize horse, one day, the son of a very rich man of Gaudadesa saw that horse and decided to buy him with the intention of selling him to the king of Gaudadesa. After having purchased that horse, he took him to the capital of Gaudadesa, When he reached the city he went straight to the palace of the king and requested the guards to inform the king of his arrival.

When he came before the king, the long inquired from him, “What has brought you here?” That business man replied, “Oh, king, in Sindhu I found a horse of the highest quality and it’s equal cannot be found in the whole universe. I paid very much money for it”. The king ordered, “Bring that horse immediately.” That horse was very quickly brought before the king who became very pleased with the high qualities of the horse. After having examined the horse, the king paid to that businessman whatever amount he had requested without thinking twice.

After some days the king decided to go hunting. Riding that horse, he set off for the forest, where he saw a deer, to which he immediately gave chase. Following behind that deer, he followed in every direction it turned. After some time he left the rest of his party far behind. After chasing for a long time and becoming very tired and thirsty, he stopped to take rest. He tied the horse to the branch of a tree and he himself sat down on a large rock.

After a little while he saw a piece of parchment blowing in the wind and land next to him on the rock. On that piece of parchment was written half a shloka of the Fifteenth Chapter of the Srimad Bhagavad-gita. The king started to read, and as the first sound came out of his mouth,, that horse fell down to the ground and gave up that horse-body. He attained a transcendental four-armed form and immediately sat down in a flower-airplane, which had come from Vaikuntha to take him to that transcendental abode Vaikuntha.

The king noticed that close by there was a beautiful ashram, which was surrounded by fruit-trees. Sitting in that ashram was a brahmana who had complete control over his senses. The king offered respects to that brahmana and with folded hands inquired from him, “How was it possible that my horse was able to attain Vaikuntha?” The brahmana, whose name was Vishnusharma, replied, “Oh, king, previously, you had a commander-in chief of your army, who was known by the name Sarabhmerund. He had planned along with the prince to usurp you from your throne. Before he was able to, he got cholera and died, after which he took birth as that horse. By chance he heard some words from the Fifteenth Chapter of the Srimad Bhagavad-gita and attained Vaikuntha.”

The king offered his respects to that brahmana and returned to his capital and again and again read what was written on that parchment. After a short time he installed his son as the king of Gaudadesa and himself went off to the forest, where he recited regularly the Fifteenth Chapter of the Srimad Bhagavad-gita and very quickly, attained the lotus feet of Lord Vishnu.

पंद्रहवें अध्याय का माहात्म्य

श्रीमहादेवजी कहते हैं पार्वती ! अब गीता के पंद्रहवें अध्याय का माहात्म्य सुनो। गौड़ देश में कृपाण नामक एक राजा थे, जिनकी तलवार की धार से युद्ध में देवता भी परास्त हो जाते थे। उनका बुद्धिमान सेनापति शस्त्र और शास्त्र की कलाओं का भण्डार था। उसका नाम था सरभमेरुण्ड। उसकी भुजाओं में प्रचण्ड बल था। एक समय उस पापी ने राजकुमारों सहित महाराज का वध करके स्वयं ही राज्य करने का विचार किया। इस निश्चय के कुछ ही दिनों बाद वह हैजे का शिकार होकर मर गया। थोड़े समय में वह पापात्मा अपने पूर्वकर्म के कारण सिन्धु देश में एक तेजस्वी घोड़ा हुआ। उसका पेट सटा हुआ था। घोड़े के लक्षणों का ठीक-ठाक ज्ञान रखने वाले किसी वैश्य पुत्र ने बहुत सा मूल्य देकर उस अश्व को खरीद लिया और यत्न के साथ उसे राजधानी तक ले आया। वैश्यकुमार वह अश्व राजा को देने को लाया था। यद्यपि राजा उस वैश्यकुमार से परिचित थे, तथापि द्वारपाल ने जाकर उसके आगमन की सूचना दी। राजा ने पूछाः किसलिए आये हो? तब उसने स्पष्ट शब्दों में उत्तर दियाः देव ! सिन्धु देश में एक उत्तम लक्षणों से सम्पन्न अश्व था, जिसे तीनों लोकों का एक रत्न समझकर मैंने बहुत सा मूल्य देकर खरीद लिया है। राजा ने आज्ञा दीः उस अश्व को यहाँ ले आओ।

वास्तव में वह घोड़ा गुणों में उच्चैःश्रवा के समान था। सुन्दर रूप का तो मानो घर ही था। शुभ लक्षणों का समुद्र जान पड़ता था। वैश्य घोड़ा ले आया और राजा ने उसे देखा। अश्व का लक्षण जानने वाले अमात्यों ने इसकी बड़ी प्रशंसा की। सुनकर राजा अपार आनन्द में निमग्न हो गये और उन्होंने वैश्य को मुँहमाँगा सुवर्ण देकर तुरन्त ही उस अश्व को खरीद लिया। कुछ दिनों के बाद एक समय राजा शिकार खेलने के लिए उत्सुक हो उसी घोड़े पर चढ़कर वन में गये। वहाँ मृगों के पीछे उन्होंने अपना घोड़ा बढ़ाया। पीछे-पीछे सब ओर से दौड़कर आते हुए समस्त सैनिकों का साथ छूट गया। वे हिरनों द्वारा आकृष्ट होकर बहुत दूर निकल गये। प्यास ने उन्हें व्याकुल कर दिया। तब वे घोड़े से उतरकर जल की खोज करने लगे। घोड़े को तो उन्होंने वृक्ष के तने के साथ बाँध दिया और स्वयं एक चट्टान पर चढ़ने लगे। कुछ दूर जाने पर उन्होंने देखा कि एक पत्ते का टुकड़ा हवा से उड़कर शिलाखण्ड पर गिरा है। उसमें गीता के पंद्रहवें अध्याय का आधा श्लोक लिखा हुआ था। राजा उसे पढ़ने लगे। उनके मुख से गीता के अक्षर सुनकर घोड़ा तुरन्त गिर पड़ा और अश्व शरीर को छोड़कर तुरंत ही दिव्य विमान पर बैठकर वह स्वर्गलोक को चला गया। तत्पश्चात् राजा ने पहाड़ पर चढ़कर एक उत्तम आश्रम देखा, जहाँ नागकेशर, केले, आम और नारियल के वृक्ष लहरा रहे थे। आश्रम के भीतर एक ब्राह्मण बैठे हुए थे, जो संसार की वासनाओं से मुक्त थे। राजा ने उन्हे प्रणाम करके बड़े भक्ति के साथ पूछाः ब्रह्मन् ! मेरा अश्व अभी-अभी स्वर्ग को चला गया है, उसमें क्या कारण है?

राजा की बात सुनकर त्रिकालदर्शी, मंत्रवेत्ता और महापुरुषों में श्रेष्ठ विष्णुशर्मा नामक ब्राह्मण ने कहाः राजन ! पूर्वकाल में तुम्हारे यहाँ जो सरभमेरुण्ड नामक सेनापति था, वह तुम्हें पुत्रों सहित मारकर स्वयं राज्य हड़प लेने को तैयार था। इसी बीच में हैजे का शिकार होकर वह मृत्यु को प्राप्त हो गया। उसके बाद वह उसी पाप से घोड़ा हुआ था। यहाँ कहीं गीता के पंद्रहवें अध्याय का आधा श्लोक लिखा मिल गया था, उसे ही तुम बाँचने लगे। उसी को तुम्हारे मुख से सुनकर वह अश्व स्वर्ग को प्राप्त हुआ है।

तदनन्तर राजा के पार्श्ववर्ती सैनिक उन्हें ढूँढते हुए वहाँ आ पहुँचे। उन सबके साथ ब्राह्मण को प्रणाम करके राजा प्रसन्नतापूर्वक वहाँ से चले और गीता के पंद्रहवें अध्याय के श्लोकाक्षरों से अंकित उसी पत्र को बाँच-बाँचकर प्रसन्न होने लगे। उनके नेत्र हर्ष से खिल उठे थे। घर आकर उन्होंने मन्त्रवेत्ता मन्त्रियों के साथ अपने पुत्र सिंहबल को राज्य सिंहासन पर अभिषिक्त किया और स्वयं पंद्रहवें अध्याय के जप से विशुद्धचित्त होकर मोक्ष प्राप्त कर लिया।

Gita Chapter 14 : Mahatmya Story

Lord Shiva said “Oh, Parvati kindly hear from Me the glories of the Fourteenth Chapter of the Srimad Bhagavad-gita, with the greatest attention.

In Simhaldvip was a king of the name Vikram-Vetala. One day, when he was going to the forest for hunting, he took his son and two hunting dogs along with him. When he reached the forest he released one dog to chase a rabbit. When that dog was chasing it, the rabbit looked as if it was flying. Running and running, that rabbit reached a beautiful hermitage, which was very peaceful. A deer were sitting happily under the shade of the trees and the monkeys were joyfully eating the fruits of those trees. The cubs of the tigers were playing with the baby elephants and snakes were crawling over the peacocks. In this forest, the great sage Vatsa lived, who worshipped Lord Krishna by reciting the Fourteenth Chapter of the Srimad Bhagavad-gita. Near the ashram of Maharaja Vatsa, one of his disciples was washing his feet while chanting the Fourteenth Chapter of Srimad Bhagavad-gita. The earth at that spot became wet. Just then that rabbit came running and slipped in the mud. Immediately that rabbit attained a heavenly body. An airplane came down, picked him up and took him off to the heavenly planets. After a moment, that dog arrived there in search of the rabbit, and he also slipped in the mud; gave up that dog body and attained a heavenly body and was also taken off to the heavenly planets.

Seeing all of this, the disciple of Maharaja Vatsa started to laugh. King Vikram-Vetala, having witnessed those amusing events inquired from that brahmana, “How is it possible that the rabbit and dog went off to heaven in front of our eyes?” That brahmana said, “In this forest, a great sage of the name Vatsa, who has completely conquered his senses, is always engaged in chanting the Fourteenth Chapter of the Srimad Bhagavad-gita. I am his disciple, and I am also by his grace always engaged in chanting the Fourteenth Chapter of the Srimad Bhagavad-gita. Due to that rabbit and dog slipping in the mud, which had been made wet from the water, which had washed my feet, they both attained the higher planets. Now I will tell you the reason why I was laughing; In Maharashtra, there is the town of the name Pratudhak. One Brahmana of the name Keshava had lived there. He was the most cruel of men. His wife’s name was Vilobbana. She was a very loose lady, who always enjoyed the company of other men. For this reason, her husband became very angry and killed her. In her next life she became that dog. And that Brahmana Keshava, due to his sinful activities became that rabbit.”

Lord Shiva said, “After hearing the glories of the Fourteenth Chapter of Srimad Bhagavad-gita, King Vikram-Vetala also began daily reciting the Fourteenth Chapter of Srimad Bhagavad-gita, when he gave up that body, he went to Vaikuntha where he was able to engage eternally in the service of the lotus-feet of Lord Vishnu.

चौदहवें अध्याय का माहात्म्य

श्रीमहादेवजी कहते हैं पार्वती ! अब मैं भव-बन्धन से छुटकारा पाने के साधनभूत चौदहवें अध्याय का माहात्म्य बतलाता हूँ, तुम ध्यान देकर सुनो। सिंहल द्वीप में विक्रम बैताल नामक एक राजा थे, जो सिंह के समान पराक्रमी और कलाओं के भण्डार थे। एक दिन वे शिकार खेलने के लिए उत्सुक होकर राजकुमारों सहित दो कुतियों को साथ लिए वन में गये। वहाँ पहुँचने पर उन्होंने तीव्र गति से भागते हुए खरगोश के पीछे अपनी कुतिया छोड़ दी। उस समय सब प्राणियों के देखते-देखते खरगोश इस प्रकार भागने लगा मानो कहीं उड़ गया है। दौड़ते-दौड़ते बहुत थक जाने के कारण वह एक बड़ी खंदक (गहरे गड्डे) में गिर पड़ा। गिरने पर भी कुतिया के हाथ नहीं आया और उस स्थान पर जा पहुँचा, जहाँ का वातावरण बहुत ही शान्त था। वहाँ हरिण निर्भय होकर सब ओर वृक्षों की छाया में बैठे रहते थे। बंदर भी अपने आप टूट कर गिरे हुए नारियल के फलों और पके हुए आमों से पूर्ण तृप्त रहते थे। वहाँ सिंह हाथी के बच्चों के साथ खेलते और साँप निडर होकर मोर की पाँखों में घुस जाते थे। उस स्थान पर एक आश्रम के भीतर वत्स नामक मुनि रहते थे, जो जितेन्द्रिय और शान्त-भाव से निरन्तर गीता के चौदहवें अध्याय का पाठ किया करते थे। आश्रम के पास ही वत्समुनि के किसी शिष्य ने अपना पैर धोया था, (ये भी चौदहवें अध्याय का पाठ करने वाले थे।) उसके जल से वहाँ की मिट्टी गीली हो गयी थी। खरगोश का जीवन कुछ शेष था। वह हाँफता हुआ आकर उसी कीचड़ में गिर पड़ा। उसके स्पर्शमात्र से ही खरगोश दिव्य विमान पर बैठकर स्वर्गलोक को चला गया फिर कुतिया भी उसका पीछा करती हुई आयी। वहाँ उसके शरीर में भी कीचड़ के कुछ छींटे लग गये फिर भूख-प्यास की पीड़ा से रहित हो कुतिया का रूप त्यागकर उसने दिव्यांगना का रमणीय रूप धारण कर लिया तथा गन्धर्वों से सुशोभित दिव्य विमान पर आरूढ़ हो वह भी स्वर्गलोक को चली गयी। यह देखकर मुनि के मेधावी शिष्य स्वकन्धर हँसने लगे। उन दोनों के पूर्वजन्म के वैर का कारण सोचकर उन्हें बड़ा विस्मय हुआ था। उस समय राजा के नेत्र भी आश्चर्य से चकित हो उठे। उन्होंने बड़ी भक्ति के साथ प्रणाम करके पूछाः

विप्रवर ! नीच योनि में पड़े हुए दोनों प्राणी – कुतिया और खरगोश ज्ञानहीन होते हुए भी जो स्वर्ग में चले गये – इसका क्या कारण है? इसकी कथा सुनाइये।

शिष्य ने कहाः भूपाल ! इस वन में वत्स नामक ब्राह्मण रहते हैं। वे बड़े जितेन्द्रिय महात्मा हैं। गीता के चौदहवें अध्याय का सदा जप किया करते हैं। मैं उन्हीं का शिष्य हूँ, मैंने भी ब्रह्मविद्या में विशेषज्ञता प्राप्त की है। गुरुजी की ही भाँति मैं भी चौदहवें अध्याय का प्रतिदिन जप करता हूँ। मेरे पैर धोने के जल में लोटने के कारण यह खरगोश कुतिया के साथ स्वर्गलोक को प्राप्त हुआ है। अब मैं अपने हँसने का कारण बताता हूँ।

महाराष्ट्र में प्रत्युदक नामक महान नगर है। वहाँ केशव नामक एक ब्राह्मण रहता था, जो कपटी मनुष्यों में अग्रगण्य था। उसकी स्त्री का नाम विलोभना था। वह स्वछन्द विहार करने वाली थी। इससे क्रोध में आकर जन्मभर के वैर को याद करके ब्राह्मण ने अपनी स्त्री का वध कर डाला और उसी पाप से उसको खरगोश की योनि में जन्म मिला। ब्राह्मणी भी अपने पाप के कारण कुतिया हुई।

श्रीमहादेवजी कहते हैं यह सारी कथा सुनकर श्रद्धालु राजा ने गीता के चौदहवें अध्याय का पाठ आरम्भ कर दिया। उससे उन्हें परमगति की प्राप्ति हुई।