Glory of the Gita – 1

धरोवाच

भगवन्परमेशान भक्तिरव्यभिचारिणी ।

प्रारब्धं भुज्यमानस्य कथं भवति हे प्रभो ।।1।।

श्री पृथ्वी देवी ने पूछाः

हे भगवन ! हे परमेश्वर ! हे प्रभो ! प्रारब्धकर्म को भोगते हुए मनुष्य को एकनिष्ठ भक्ति कैसे प्राप्त हो सकती है?(1)

 Dharovaacha:

Bhagavan parameshaana bhaktiravyabhichaarinee;
Praarabdham bhujyamaanasya katham bhavati he prabho.

The Earth said:

1. O Bhagavan, the Supreme Lord! How can unflinching devotion arise in him who is immersed in his Prarabdha Karmas (worldly life), O Lord? 

श्रीविष्णुरुवाच

प्रारब्धं भुज्यमानो हि गीताभ्यासरतः सदा ।

स मुक्तः स सुखी लोके कर्मणा नोपलिप्यते ।।2।।

श्री विष्णु भगवान बोलेः

प्रारब्ध को भोगता हुआ जो मनुष्य सदा श्रीगीता के अभ्यास में आसक्त हो वही इस लोक में मुक्त और सुखी होता है तथा कर्म में लेपायमान नहीं होता |(2)

 Sri Vishnuruvaacha:

Praarabdham bhujyamaano hi geetaabhyaasaratah sadaa;
Sa muktah sa sukhee loke karmanaa nopalipyate.

Lord Vishnu said:

2. Though engaged in the performance of worldly duties, one who is regular in the study of the Gita becomes free. He is the happy man in this world. He is not bound by Karma. 

महापापादिपापानि गीताध्यानं करोति चेत् ।

क्वचित्स्पर्शं न कुर्वन्ति नलिनीदलमम्बुवत् ।।3।।

जिस प्रकार कमल के पत्ते को जल स्पर्श नहीं करता उसी प्रकार जो मनुष्य श्रीगीता का ध्यान करता है उसे महापापादि पाप कभी स्पर्श नहीं करते |(3)

 Mahaapaapaadipaapaani geetaadhyaanam karoti chet; 

Kwachit sparsham na kurvanti nalineedalam ambuvat.

3. Just as the water stains not the lotus leaf, even so sins do not taint him who is regular in the recitation of the Gita

गीतायाः पुस्तकं यत्र पाठः प्रवर्तते।

तत्र सर्वाणि तीर्थानि प्रयागादीनि तत्र वै।।4।।

जहाँ श्रीगीता की पुस्तक होती है और जहाँ श्रीगीता का पाठ होता है वहाँ प्रयागादि सर्व तीर्थ निवास करते हैं |(4)

 Geetaayaah pustakam yatra yatra paathah pravartate;

Tatra sarvaani teerthaani prayaagaadeeni tatra vai.

4. All the sacred centres of pilgrimage, like Prayag and other places, dwell in that place where the Gita is kept, and where the Gita is read.

सर्वे देवाश्च ऋषयो योगिनः पन्नगाश्च ये।

गोपालबालकृष्णोsपि नारदध्रुवपार्षदैः ।।

सहायो जायते शीघ्रं यत्र गीता प्रवर्तते ।।5।।

जहाँ श्रीगीता प्रवर्तमान है वहाँ सभी देवों, ऋषियों, योगियों, नागों और गोपालबाल श्रीकृष्ण भी नारद, ध्रुव आदि सभी पार्षदों सहित जल्दी ही सहायक होते हैं |(5)

Sarve devaashcha rishayo yoginahpannagaashcha ye;
Gopaalaa gopikaa vaapi naaradoddhava paarshadaih.

5. All the gods, sages, Yogins, divine serpents, Gopalas, Gopikas (friends and devotees of Lord Krishna), Narada, Uddhava and others (dwell here). 

Contd……

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