Chapter 2 Verses 36

Avaachyavaadaamshcha bahoon vadishyanti tavaahitaah;
Nindantastava saamarthyam tato duhkhataram nu kim.

36. Thy enemies also, cavilling at thy power, will speak many abusive words. What is more painful than this!

अवाच्यवादांश्च बहून् वदिष्यन्ति तवाहिताः।

निन्दन्तस्तव सामर्थ्यं ततो दुःखतरं नु किम्।।36।।

तेरे वैरी लोग तेरे सामर्थ्य की निन्दा करते हुए तुझे बहुत से न कहने योग्य वचन भी कहेंगे | उससे अधिक दुःख और क्या होगा?(36)

Chapter 2 Verses 35

Bhayaad ranaad uparatam mamsyante twaam mahaarathaah;
Yeshaam cha twam bahumato bhootwaa yaasyasi laaghavam.

35. The great car-warriors will think that thou hast withdrawn from the battle through fear; and thou wilt be lightly held by them who have thought much of thee.

भयाद्रणादुपरतं मंस्यन्ते त्वां महारथाः।

येषां च त्वं बहुमतो भूत्वा यास्यसि लाघवम्।।35।.

और जिनकी दृष्टि में तू पहले बहुत सम्मानित होकर अब लघुता को प्राप्त होगा, वे महारथी लोग तुझे भय के कारण युद्ध में हटा हुआ मानेंगे |(35)

Chapter 2 Verses 34

Akeertim chaapi bhootaani kathayishyanti te’vyayaam;
Sambhaavitasya chaakeertir maranaad atirichyate.

34. People, too, will recount thy everlasting dishonour; and to one who has been honoured, dishonour is worse than death.

अकीर्तिं चापि भूतानि कथयिष्यन्ति तेऽव्ययाम्।

सम्भावितस्य चाकीर्तिर्मरणादतिरिच्यते।।34।।

 तथा सब लोग तेरी बहुत काल तक रहने वाली अपकीर्ति भी कथन करेंगे और माननीय पुरुष के लिए अपकीर्ति मरण से भी बढ़कर है |(34)

Chapter 2 Verses 33

Atha chettwam imam dharmyam samgraamam na karishyasi;
Tatah swadharmam keertim cha hitwaa paapam avaapsyasi.

33. But, if thou wilt not fight in this righteous war, then, having abandoned thine duty and fame, thou shalt incur sin.

अथ चेत्त्वमिमं धम् र्यं संग्रामं न करिष्यसि।

ततः स्वधर्मं कीर्तिं च हित्वा पापमवाप्स्यसि।।33।।

किन्तु यदि तू इस धर्मयुक्त युद्ध को नहीं करेगा तो स्वधर्म और कीर्ति को खोकर पाप को प्राप्त होगा |(33)

 

 

 

 

Chapter 2 Verses 32

Yadricchayaa chopapannam swargadwaaram apaavritam;
Sukhinah kshatriyaah paartha labhante yuddham eedrisham
.

32. Happy are the Kshatriyas, O Arjuna, who are called upon to fight in such a battle that comes of itself as an open door to heaven!

यदृच्छया चोपपन्नं स्वर्गद्वारमपावृतम्।

सुखिनः क्षत्रियाः पार्थ लभन्ते युद्धमीदृशम्।।32।।

हे पार्थ ! अपने आप प्राप्त हुए और खुले हुए स्वर्ग के द्वाररूप इस प्रकार के युद्ध को भाग्यवान क्षत्रिय लोग ही पाते हैं | (32)

 

 

 

 

 

Chapter 2 Verses 31

Swadharmam api chaavekshya na vikampitum arhasi;
Dharmyaaddhi yuddhaacchreyo’nyat kshatriyasya na vidyate.

31. Further, having regard to thy own duty, thou shouldst not waver, for there is nothing higher for a Kshatriya than a righteous war.

स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि।

धम् र्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते।।31।।

तथा अपने धर्म को देखकर भी तू भय करने योग्य नहीं है अर्थात् तुझे भय नहीं करना चाहिए क्योंकि क्षत्रिय के लिए धर्मयुक्त युद्ध से बढ़कर दूसरा कोई कल्याणकारी कर्तव्य नहीं है | (31)

 

 

 

 

 

Chapter 2 Verses 30

Dehee nityam avadhyo’yam dehe sarvasya bhaarata;
Tasmaat sarvaani bhootaani na twam shochitum arhasi.

30. This, the Indweller in the body of everyone, is always indestructible, O Arjuna! Therefore, thou shouldst not grieve for any creature.

देही नित्यमवध्योऽयं देहे सर्वस्य भारत।

तस्मात्सर्वाणि भूतानि न त्वं शोचितुमर्हसि।।30।।

 

हे अर्जुन ! यह आत्मा सबके शरीरों में सदा ही अवध्य है | इस कारण सम्पूर्ण प्राणियों के लिए तू शोक करने के योग्य नहीं है | (30)