Chapter 2 Verses 29

Aashcharyavat pashyati kashchid enam
    Aashcharyavad vadati tathaiva chaanyah;

Aashcharyavacchainam anyah shrinoti
    Shrutwaapyenam veda na chaiva kashchit.

29.  One sees This (the Self) as a wonder; another speaks of It as a wonder; another hears of It as a wonder; yet, having heard, none understands It at all.

आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेन-

माश्चर्यवद्वदति तथैव चान्यः।

आश्चर्यवच्चैनमन्यः श्रुणोति

श्रुत्वाप्येनं वेद न चैव कश्चित्।।29।।

कोई एक महापुरुष ही इस आत्मा को आश्चर्य की भाँति देखता है और वैसे ही दूसरा कोई महापुरुष ही इसके तत्त्व का आश्चर्य की भाँति वर्णन करता है तथा दूसरा कोई अधिकारी पुरुष ही इसे आश्चर्य की भाँति सुनता है और कोई-कोई तो सुनकर भी इसको नहीं जानता | (29)

 

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Chapter 2 Verses 28

Avyaktaadeeni bhootaani vyaktamadhyaani bhaarata;
Avyakta nidhanaanyeva tatra kaa paridevanaa.

28. Beings are unmanifested in their beginning, manifested in their middle state, O Arjuna, and unmanifested again in their end! What is there to grieve about?

अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत।

अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना।।28।।

हे अर्जुन ! सम्पूर्ण प्राणी जन्म से पहले अप्रकट थे और मरने के बाद भी अप्रकट हो जाने वाले हैं, केवल बीच में ही प्रकट है फिर ऐसी स्थिति में क्या शोक करना है? (28)

 

 

 

 

 

Chapter 2 Verses 27

Jaatasya hi dhruvo mrityur dhruvam janma mritasya cha;
Tasmaad aparihaarye’rthe na twam shochitum arhasi.

27. For, certain is death for the born and certain is birth for the dead; therefore, over the inevitable thou shouldst not grieve.

जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च।

तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि।।27।।

 क्योंकि इस मान्यता के अनुसार जन्मे हुए की मृत्यु निश्चित है और मरे हुए का जन्म निश्चित है | इससे भी इस बिना उपाय वाले विषम में तू शोक करने के योग्य नहीं है | (27)

Chapter 2 Verses 26

Atha chainam nityajaatam nityam vaa manyase mritam;
Tathaapi twam mahaabaaho naivam shochitum arhasi.

26. But, even if thou thinkest of It as being constantly born and dying, even then, O mighty-armed, thou shouldst not grieve!

अथ चैनं नित्यजातं नित्यं वा मन्यसे मृतम्।

तथापि त्वं महाबाहो नैवं शोचितुमर्हसि।।26।।

किन्तु यदि तू इस आत्मा को सदा जन्मनेवाला तथा सदा मरने वाला मानता है, तो भी हे महाबाहो ! तू इस प्रकार शोक करने को योग्य नहीं है | (26)

 

 

 

Chapter 2 Verses 23

Nainam cchindanti shastraani nainam dahati paavakah;
Na chainam kledayantyaapo na shoshayati maarutah.

23. Weapons cut It not, fire burns It not, water wets It not, wind dries It not.

 नैनं छिदन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः

न चैनं क्लेयन्तयापो न शोषयति मारुतः।।23।।

इस आत्मा को शस्त्र काट नहीं सकते, इसको आग जला नहीं सकती, इसको जल गला नहीं सकता और वायु सुखा नहीं सकती |

 

Chapter 2 Verses 25

Avyakto’yam achintyo’yam avikaaryo’yam uchyate;
Tasmaad evam viditwainam naanushochitum arhasi.

25. This (Self) is said to be unmanifested, unthinkable and unchangeable. Therefore, knowing This to be such, thou shouldst not grieve.

अव्यक्तोऽयमचिन्तयोऽयमविकार्योऽयमुच्यते।

तस्मादेवं विदित्वैनं नानुशोचितुमर्हसि।।25।

यह आत्मा अव्यक्त है, यह आत्मा अचिन्त्य है और यह आत्मा विकाररहित कहा जाता है | इससे हे अर्जुन ! इस आत्मा को उपर्युक्त प्रकार से जानकर तू शोक करने के योग्य नहीं है अर्थात् तुझे शोक करना उचित नहीं है | (25)

Chapter 2 Verses 24

Acchedyo’yam adaahyo’yam akledyo’shoshya eva cha;
Nityah sarvagatah sthaanur achalo’yam sanaatanah.

24. This Self cannot be cut, burnt, wetted nor dried up. It is eternal, all-pervading, stable, ancient and immovable.

अच्छेद्योऽयमदाह्योऽयमक्लेद्योऽशोष्य एव च।

नित्यः सर्वगतः स्थानुरचलोऽयं सनातनः।।24।।

क्योंकि यह आत्मा अच्छेद्य है, यह आत्मा अदाह्या, अक्लेद्य और निःसंदेह अशोष्य है तथा यह आत्मा नित्य, सर्वव्यापि, अचल स्थिर रहने वाला और सनातन है | (24)