Chapter 3 Verses 12

Ishtaan bhogaan hi vo devaa daasyante yajnabhaavitaah;
Tair dattaan apradaayaibhyo yo bhungkte stena eva sah.

12. The gods, nourished by the sacrifice, will give you the desired objects. So, he who enjoys the objects given by the gods without offering (in return) to them, is verily a thief.

इष्टान्भोगान्हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः।

तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुंक्ते स्तेन एव सः।।12।।

यज्ञ के द्वारा बढ़ाये हुए देवता तुम लोगों को बिना माँगे ही इच्छित भोग निश्चय ही देते रहेंगे | इस प्रकार उन देवताओं के द्वारा दिये हुए भोगों को जो पुरुष उनको बिना दिये स्वयं भोगता है, वह चोर ही है |(12)

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Chapter 3 Verses 11

Devaan bhaavayataanena te devaa bhaavayantu vah;
Parasparam bhaavayantah shreyah param avaapsyatha

11. With this do ye nourish the gods, and may the gods nourish you; thus nourishing one another, ye shall attain to the highest good.

देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः।

परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ।।11।।

तुम लोग इस यज्ञ के द्वारा देवताओं को उन्नत करो और वे देवता तुम लोगों को उन्नत करें | इस प्रकार निःस्वार्थभाव से एक-दूसरे को उन्नत करते हुए तुम लोग परम कल्याण को प्राप्त हो जाओगे |(11)

Chapter 3 Verses 10

Sahayajnaah prajaah srishtwaa purovaacha prajaapatih;
Anena prasavishyadhwam esha vo’stvishtakaamadhuk.

10. The Creator, having in the beginning of creation created mankind together with sacrifice, said: “By this shall ye propagate; let this be the milch cow of your desires (the cow which yields the desired objects)”.

सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः।

अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्तिवष्टकामधुक्।।10।।

प्रजापति ब्रह्मा ने कल्प के आदि में यज्ञ सहित प्रजाओं को रचकर उनसे कहा कि तुम लोग इस यज्ञ के द्वारा वृद्धि को प्राप्त होओ और यह यज्ञ तुम लोगों को इच्छित भोग प्रदान करने वाला हो |(10)

Chapter 3 Verses 9

Yajnaarthaat karmano’nyatra loko’yam karmabandhanah;
Tadartham karma kaunteya muktasangah samaachara.

9. The world is bound by actions other than those performed for the sake of sacrifice; do thou, therefore, O son of Kunti, perform action for that sake (for sacrifice) alone, free from attachment!

यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः।

तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसङ्गः समाचर।।9।।

यज्ञ के निमित्त किये जाने कर्मों के अतिरिक्त दूसरे कर्मों में लगा हुआ ही यह मनुष्य समुदाय कर्मों से बँधता है | इसलिए हे अर्जुन ! तू आसक्ति से रहित होकर उस यज्ञ के निमित्त ही भलीभाँति कर्तव्य कर्म कर |(9)

Chapter 3 Verses 8

Niyatam kuru karma twam karma jyaayo hyakarmanah;
Shareerayaatraapi cha te na prasiddhyed akarmanah.

8. Do thou perform thy bounden duty, for action is superior to inaction and even the maintenance of the body would not be possible for thee by inaction.

नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः।

शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्धयेदकर्मणः।।8।।

तू शास्त्रविहित कर्तव्य कर्म कर, क्योंकि कर्म न करने की अपेक्षा कर्म करना श्रेष्ठ है तथा कर्म न करने से तेरा शरीर निर्वाह भी सिद्ध नहीं होगा |(8)

Chapter 3 Verses 7

Yastwindriyaani manasaa niyamyaarabhate’rjuna;
Karmendriyaih karmayogam asaktah sa vishishyate.

7. But whosoever, controlling the senses by the mind, O Arjuna, engages himself in Karma Yoga with the organs of action, without attachment, he excels!

यस्त्विन्द्रियाणी मनसा नियम्यारभतेऽर्जुन।

कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगमसक्तः स विशिष्यते।।7।।

किन्तु हे  अर्जुन ! जो पुरुष मन से इन्द्रियों को वश में करके अनासक्त हुआ समस्त इन्द्रियों द्वारा कर्मयोग का आचरण करता है, वही श्रेष्ठ है |(7)

 

Chapter 3 Verses 6

Karmendriyaani samyamya ya aaste manasaa smaran;
Indriyaarthaan vimoodhaatmaa mithyaachaarah sa uchyate.

6. He who, restraining the organs of action, sits thinking of the sense-objects in mind, he, of deluded understanding, is called a hypocrite.

कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन्।

इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते।।6।।

जो मूढबुद्धि मनुष्य समस्त इन्द्रियों को हठपूर्वक ऊपर से रोककर मन से उन इन्द्रियों के विषयों का चिन्तन करता रहता है, वह मिथ्याचारी अर्थात् दम्भी कहा जाता है |(6)