Gita Chapter 18 : Mahatmya Story

Parvati said “My dear husband, you have told me the glories of the Seventeenth Chapter of the Srimad Bhagavad-gita, now kindly relate the glories of the Eighteenth Chapter of Srimad Bhagavad-gita.

Lord Shiva said; “Oh daughter of the Himalayas (Parvati), please listen to the glories of the Eighteenth Chapter of Srimad Bhagavad-Gita, which is higher than the Vedas and the giver of unlimited bliss. When it enters into one’s ears it destroys all material desires. For the pure devotee, it is divine nectar, it is Lord Vishnu’s very life and it is a solace to the hearts of Lord Indra and the demigods as well as the great yogis headed by Sanaka and Sananda.

One who recites it sends the messengers of Yamaraja far away. There is no other recitation, which can so quickly destroy all sin and free one from the threefold miseries of this world. Now listen with great devotion.

On the topmost peak of Mount Meru is Amaravati, which was built by Visvakarma. In [hat heavenly kingdom, Lord Indra along with his wife Saci is served by the demigods. One day while Lord Indra was sitting peacefully, he saw that one very beautiful person had arrived there, whom the servants of Lord Vishnu were serving. When. Lord Indra saw that beautiful young person; he immediately fell from his throne unto the ground. At that time those demigod who had been worshipping Indra picked up the crown that he was wearing and placed it on the head of that new beautiful person. After that, all the demigods and other denizens of the heavenly planets started to perform arati and sing wonderful songs to that new King Indra. The great rishis came there and offered their blessings and chanted Vedic mantras and the Gandharvas and Apsaras started to sing and dance joyfully. In this way, the new Indra, who had not performed the usual one hundred horse sacrifices, started to enjoy hundreds of different types of services rendered by the demigods and other denizens of the heavenly planets. When the old Indra saw this he became very surprised.

He started to think to himself, “This person here has never built wells or dug kunds or planted trees for the welfare of others, and when there were droughts, he did not provide grains in charity. He never performed any fire-sacrifices or great charities in the holy places. So how has he managed to attain my seat?” The old Indra, feeling greatly disturbed in his mind, left to the ocean of milk to pray to Lord Vishnu. When he managed to obtain darshan of Lord Vishnu, he asked Him “My dear Lord Vishnu, in the past I performed many sacrifices and other pious activities, for which I was installed as the Lord of heaven. But at this time another person has come there and taken my place as the king of heaven. This person in his life never performed any great, wonderful pious activities, nor had he performed any great Vedic sacrifices. So, how is it possible that he has managed to obtain my throne?”

At that time Lord Vishnu said, “My dear Indra, That great soul has performed the recitation daily of the Eighteenth Chapter of the Srimad Bhagavad-gita. Everyday during his life, he recited five Shlokas from this Chapter, and because of that activity he has attained the results of all sorts of pious activities and yajnas and after enjoying for many years as the king of heaven, he will attain My personal abode. If you perform the same activity of reciting the Eighteenth Chapter of Srimad Bhagavad-gita, you can also attain My divine abode.”

After hearing Lord Vishnu’s words, Lord Indra took the form of a brahmana and went to the bank of the Godavari River, where he saw the town of Kalegrani, which is very sacred. At that place, the Supreme Lord in His form known as Kalesva, resides. Close to this town, on the bank of the Godavari river, one very pure brahmana was sitting, who was very merciful and had understood the topmost goal and secret of the Vedic literatures. Daily he would sit at that spot and recite Shlokas of the Eighteenth Chapter of Srimad Bhagavad-gita. When Lord Indra saw him he became very happy. He immediately fell at his lotus-feet and requested him to teach him the Eighteenth Chapter of Srimad Bhagavad-gita. After Lord Indra had practiced the recitation, of the Eighteenth Chapter of Srimad Bhagavad-gita for sometime he managed to attain the topmost place of Vishnuloka. When he attained that place, he realized that the pleasure he had enjoyed as King Indra, along with the demigods, was nothing in comparison.

My dear Parvati, for this reason, the great sages, especially chant this Eighteenth Chapter of Srimad Bhagavad-gita and by so doing very quickly attain the lotus-feet of Lord Vishnu.

Anyone who hears or studies this Gita Mahatmya very quickly destroys all sins, which he has accumulated. And that person, who remembers this discourse with great faith attains the results of all kinds of pious activities and great sacrifices, and after enjoying all worldly opulence, attains the abode of Lord Vishnu.

अठारहवें अध्याय का माहात्म्य

श्रीपार्वतीजी ने कहाः भगवन् ! आपने सत्रहवें अध्याय का माहात्म्य बतलाया। अब अठारहवें अध्याय के माहात्म्य का वर्णन कीजिए।

श्रीमहादेवजी कहाः गिरिनन्दिनी ! चिन्मय आनन्द की धारा बहाने वाले अठारहवें अध्याय के पावन माहात्म्य को जो वेद से भी उत्तम है, श्रवण करो। वह सम्पूर्ण शास्त्रों का सर्वस्व, कानों में पड़ा हुआ रसायन के समान तथा संसार के यातनाजाल को छिन्नभिन्न करने वाला है। सिद्ध पुरुषों के लिए यह परम रहस्य की वस्तु है। इसमें अविद्या का नाश करने की पूर्ण क्षमता है। यह भगवान विष्णु की चेतना तथा सर्वश्रेष्ठ परम पद है। इतना ही नहीं, यह विवेकमयी लता का मूल, कामक्रोध और मद को नष्ट करने वाला, इन्द्र आदि देवताओं के चित्त का विश्राममन्दिर तथा सनकसनन्दन आदि महायोगियों का मनोरंजन करने वाला है। इसके पाठमात्र से यमदूतों की गर्जना बन्द हो जाती है। पार्वती ! इससे बढ़कर कोई ऐसा रहस्यमय उपदेश नहीं है, जो संतप्त मानवों के त्रिविध ताप को हरने वाला और बड़ेबड़े पातकों का नाश करने वाला हो। अठारहवें अध्याय का लोकोत्तर माहात्म्य है। इसके सम्बन्ध में जो पवित्र उपाख्यान है, उसे भक्तिपूर्वक सुनो। उसके श्रवणमात्र से जीव समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।

मेरुगिरि के शिखर अमरावती नामवाली एक रमणीय पुरी है। उसे पूर्वकाल में विश्वकर्मा ने बनाया था। उस पुरी में देवताओं द्वारा सेवित इन्द्र शची के साथ निवास करते थे। एक दिन वे सुखपूर्वक बैठे हुए थे, इतने ही में उन्होंने देखा कि भगवान विष्णु के दूतों से सेवित एक अन्य पुरुष वहाँ रहा है। इन्द्र उस नवागत पुरुष के तेज से तिरस्कृत होकर तुरन्त ही अपने मणिमय सिंहासन से मण्डप में गिर पड़े। तब इन्द्र के सेवकों ने देवलोक के साम्राज्य का मुकुट इस नूतन इन्द्र के मस्तक पर रख दिया। फिर तो दिव्य गीत गाती हुई देवांगनाओं के साथ सब देवता उनकी आरती उतारने लगे। ऋषियों ने वेदमंत्रों का उच्चारण करके  उन्हें अनेक आशीर्वाद दिये। गन्धर्वों का ललित स्वर में मंगलमय गान होने लगा।

इस प्रकार इस नवीन इन्द्र का सौ यज्ञों का अनुष्ठान किये बिना ही नाना प्रकार के उत्सवों से सेवित देखकर पुराने इन्द्र को बड़ा विस्मय हुआ। वे सोचने लगेःइसने तो मार्ग में कभी पौंसले (प्याऊ) बनवाये हैं, पोखरे खुदवाये है और पथिकों को विश्राम देने वाले बड़ेबड़े वृक्ष ही लगवाये है। अकाल पड़ने पर अन्न दान के द्वारा इसने प्राणियों का सत्कार भी नहीं किया है। इसके द्वारा तीर्थों में सत्र और गाँवों में यज्ञ का अनुष्ठान भी नहीं हुआ है। फिर इसने यहाँ भाग्य की दी हुई ये सारी वस्तुएँ कैसे प्राप्त की हैं? इस चिन्ता से व्याकुल होकर इन्द्र भगवान विष्णु से पूछने के लिए प्रेमपूर्वक क्षीरसागर के तट पर गये और वहाँ अकस्मात अपने साम्राज्य से भ्रष्ट होने का दुःख निवेदन करते हुए बोलेः

लक्ष्मीकान्त ! मैंने पूर्वकाल में आपकी प्रसन्नता के लिए सौ यज्ञों का अनुष्ठान किया था। उसी के पुण्य से मुझे इन्द्रपद की प्राप्ति हुई थी, किन्तु इस समय स्वर्ग में कोई दूसरा ही इन्द्र अधिकार जमाये बैठा है। उसने तो कभी धर्म का अनुष्ठान किया है यज्ञों का फिर उसने मेरे दिव्य सिंहासन पर कैसे अधिकार जमाया है?’

श्रीभगवान बोलेः इन्द्र ! वह गीता के अठारहवें अध्याय में से पाँच श्लोकों का प्रतिदिन पाठ करता है। उसी के पुण्य से उसने तुम्हारे उत्तम साम्राज्य को प्राप्त कर लिया है। गीता के अठारहवें अध्याय का पाठ सब पुण्यों का शिरोमणि है। उसी का आश्रय लेकर तुम भी पद पर स्थिर हो सकते हो।

भगवान विष्णु के ये वचन सुनकर और उस उत्तम उपाय को जानकर इन्द्र ब्राह्मण का वेष बनाये गोदावरी के तट पर गये। वहाँ उन्होंने कालिकाग्राम नामक उत्तम और पवित्र नगर देखा, जहाँ काल का भी मर्दन करने वाले भगवान कालेश्वर विराजमान हैं। वही गोदावर तट पर एक परम धर्मात्मा ब्राह्मण बैठे थे, जो बड़े ही दयालु और वेदों के पारंगत विद्वान थे। वे अपने मन को वश में करके प्रतिदिन गीता के अठारहवें अध्याय का स्वाध्याय किया करते थे। उन्हें देखकर इन्द्र ने बड़ी प्रसन्नता के साथ उनके दोनों चरणों में मस्तक झुकाया और उन्हीं अठारहवें अध्याय को पढ़ा। फिर उसी के पुण्य से उन्होंने श्री विष्णु का सायुज्य प्राप्त कर लिया। इन्द्र आदि देवताओं का पद बहुत ही छोटा है, यह जानकर वे परम हर्ष के साथ उत्तम वैकुण्ठधाम को गये। अतः यह अध्याय मुनियों के लिए श्रेष्ठ परम तत्त्व है। पार्वती ! अठारहवे अध्याय के इस दिव्य माहात्म्य का वर्णन समाप्त हुआ। इसके श्रवण मात्र से मनुष्य सब पापों से छुटकारा पा जाता है। इस प्रकार सम्पूर्ण गीता का पापनाशक माहात्म्य बतलाया गया। महाभागे ! जो पुरुष श्रद्धायुक्त होकर इसका श्रवण करता है, वह समस्त यज्ञों का फल पाकर अन्त में श्रीविष्णु का सायुज्य प्राप्त कर लेता है।

One Response

  1. hi i got this app for window phone nice storys

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