Chapter 3 Verses 38

Dhoomenaavriyate vahnir yathaadarsho malena cha;
Yatholbenaavrito garbhas tathaa tenedam aavritam.

38. As fire is enveloped by smoke, as a mirror by dust, and as an embryo by the amnion, so is this enveloped by that.

धूमेनाव्रियते वह्निर्यथादर्शो मलेन च।

यथोल्बेनावृतो गर्भस्तथा तेनेदमावृतम्।।38।।

जिस प्रकार धुएँ से अग्नि और मैल से दर्पण ढका जाता है तथा जिस प्रकार जेर से गर्भ ढका रहता है, वैसे ही उस काम के द्वारा यह ज्ञान ढका रहता है |(38)

Chapter 3 Verses 37

Sri Bhagavaan Uvaacha:

Kaama esha krodha esha rajoguna samudbhavah;
Mahaashano mahaapaapmaa viddhyenam iha vairinam.

The Blessed Lord said:

37. It is desire, it is anger born of the quality of Rajas, all-sinful and all-devouring; know this as the foe here (in this world).

श्रीभगवानुवाच

काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद् भवः

महाशनो महापाप्मा विद्धेयनमिह वैरिणम्।।37।।

श्री भगवान बोलेः रजोगुण से उत्पन्न हुआ यह काम ही क्रोध है, यह बहुत खाने वाला अर्थात् भोगों से कभी न अघाने वाला और बड़ा पापी है, इसको ही तू इस विषय में वैरी जान |(37)

Chapter 3 Verses 36

Arjuna Uvaacha:

Atha kena prayukto’yam paapam charati poorushah;
Anicchann api vaarshneya balaad iva niyojitah.

Arjuna said:

36. But impelled by what does man commit sin, though against his wishes, O Varshneya (Krishna), constrained, as it were, by force?

अर्जुन उवाच

अथ केन प्रयुक्तोऽयं पापं चरति पुरुषः।

अनिच्छन्नपि वार्ष्णेय बलादिव नियोजितः।।36।।

अर्जुन बोलेः हे कृष्ण ! तो फिर यह मनुष्य स्वयं न चाहता हुआ भी बलात् लगाये हुए की भाँति किससे प्रेरित होकर पाप का आचरण करता है? (36)

Chapter 3 Verses 35

Shreyaan swadharmo vigunah paradharmaat swanushthitaat;
Swadharme nidhanam shreyah paradharmo bhayaavahah.

35. Better is one’s own duty, though devoid of merit, than the duty of another well discharged. Better is death in one’s own duty; the duty of another is fraught with fear

श्रेयान्स्वधर्मो विगुण परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।

स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः।।35।।

अच्छी प्रकार आचरण में लाये हुए दूसरे के धर्म से गुण रहित भी अपना धर्म अति उत्तम है | अपने धर्म में तो मरना भी कल्याणकारक है और दूसरे का धर्म भय को देने वाला है |(35)

Chapter 3 Verses 34

Indriyasyendriyasyaarthe raagadweshau vyavasthitau;
Tayor na vasham aagacchet tau hyasya paripanthinau.

34. Attachment and aversion for the objects of the senses abide in the senses; let none come under their sway, for they are his foes.

इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ।

तयोर्न वशमागच्छेतौ ह्यस्य परिपन्थिनौ।।34।।

इन्द्रिय-इन्द्रिय के अर्थ में अर्थात् प्रत्येक इन्द्रिय के विषय में राग और द्वेष छिपे हुए स्थित हैं | मनुष्य को उन दोनों के वश में नहीं होना चाहिए, क्योंकि वे दोनों ही इसके कल्याण मार्ग में विघ्न करने वाले महान शत्रु हैं |(34)

Chapter 3 Verses 33

Sadrisham cheshtate swasyaah prakriter jnaanavaan api;
Prakritim yaanti bhootaani nigrahah kim karishyati.

33. Even a wise man acts in accordance with his own nature; beings will follow nature; what can restraint do?

सदृशं चेष्टते स्वस्याः प्रकृतेर्ज्ञानवानपि।

प्रकृतिं यान्ति भूतानि निग्रहः किं करिष्यति।।33।।

सभी प्राणी प्रकृति को प्राप्त होते हैं अर्थात् अपने स्वभाव के परवश हुए कर्म करते हैं | ज्ञानवान भी अपनी प्रकृति के अनुसार चेष्टा करते है | फिर इसमें किसी का हठ क्या करेगा |(33)

Chapter 3 Verses 32

Ye twetad abhyasooyanto naanutishthanti me matam;
Sarvajnaanavimoodhaam staan viddhi nashtaan achetasah.

32. But those who carp at My teaching and do not practise it, deluded in all knowledge and devoid of discrimination, know them to be doomed to destruction.

ये त्वेतदभ्यसूयन्तो नानुतिष्ठन्ति मे मतम्।

सर्वज्ञाननिमूढांस्तान्विद्धि नष्टानचेतसः।।32।।

 परन्तु जो मनुष्य मुझमें दोषारोपण करते हुए मेरे इस मत के अनुसार नहीं चलते हैं, उन मूर्खों को तू सम्पूर्ण ज्ञानों में मोहित और नष्ट हुए ही समझ |(32)