Chapter 4 Verses 6

Ajo’pi sannavyayaatmaa bhootaanaam eeshwaro’pi san;
Prakritim swaam adhishthaaya sambhavaamyaatmamaayayaa.

6. Though I am unborn and of imperishable nature, and though I am the Lord of all beings, yet, ruling over My own Nature, I am born by My own Maya.


अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन्।

प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय संभवाम्यात्ममायया।।6।।

मैं अजन्मा और अविनाशीस्वरूप होते हुए भी तथा समस्त प्राणियों का ईश्वर होते हुए भी अपनी प्रकृति को आधीन करके अपनी योगमाया से प्रकट होता हूँ |(6)

 


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Chapter 4 Verses 5

Bahooni me vyateetaani janmaani tava chaarjuna;
Taanyaham veda sarvaani na twam vettha parantapa.

5. Many births of Mine have passed, as well as of thine, O Arjuna! I know them all but thou knowest not, O Parantapa!


श्री भगवानुवाच

बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन।

तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परंतप।।5।।

श्री भगवान बोलेः हे परंतप अर्जुन ! मेरे और तेरे बहुत से जन्म हो चुके हैं | उन सबको तू नहीं जानता, किन्तु मैं जानता हूँ |

Chapter 4 Verses 4

Aparam bhavato janma param janma vivaswatah;
Katham etadvijaaneeyaam twam aadau proktavaan iti.

4. Later on was Thy birth, and prior to it was the birth of Vivasvan (the Sun); how am I to understand that Thou didst teach this Yoga in the beginning?


अर्जुन उवाच

अपरं भवतो जन्म परं जन्म विवस्वतः।

कथमेतद्विजानीयां त्वमादौ प्रोक्तवानिति।।4।।

अर्जुन बोलेः आपका जन्म तो अर्वाचीन – अभी हाल ही का है और सूर्य का जन्म बहुत पुराना है अर्थात् कल्प के आदि में हो चुका था | तब मैं इस बात को कैसे समझूँ कि आप ही ने कल्प के आदि में यह योग कहा था?(4)

Chapter 4 Verses 3

Sa evaayam mayaa te’dya yogah proktah puraatanah;
Bhakto’si me sakhaa cheti rahasyam hyetad uttamam.

3. That same ancient Yoga has been today taught to thee by Me, for, thou art My devotee and friend; it is the supreme secret.


स एवायं मया तेऽद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः

भक्तोऽसि मे सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम्।।3।।

तू मेरा भक्त और प्रिय सखा है, इसलिए यह पुरातन योग आज मैंने तुझे कहा है, क्योंकि यह बड़ा ही उत्तम रहस्य है अर्थात् गुप्त रखने योग्य विषय है |(3)

Chapter 4 Verses 2

Evam paramparaa praaptam imam raajarshayo viduh;
Sa kaaleneha mahataa yogo nashtah parantapa.

2. This, handed down thus in regular succession, the royal sages knew. This Yoga, by a long lapse of time, has been lost here, O Parantapa (burner of foes)!


एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः।

स कालेनेह महता योगो नष्टः परंतप।।2।।

हे परंतप अर्जुन ! इस प्रकार परम्परा से प्राप्त इस योग को राजर्षियों ने जाना, किन्तु उसके बाद वह योग बहुत काल से इस पृथ्वी लोक में लुप्तप्राय हो गया |(2)

Chapter 4 Verses 1

Imam vivaswate yogam proktavaan aham avyayam;
Vivaswaan manave praaha manur ikshwaakave’braveet.

1. I taught this imperishable Yoga to Vivasvan; he told it to Manu; Manu proclaimed it to Ikshvaku.


।। अथ चतुर्थोऽध्यायः ।।

श्री भगवानुवाच

इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम्।

विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत्।।1।।

श्री भगवान बोलेः मैंने इन अविनाशी योग को सूर्य से कहा था | सूर्य ने अपने पुत्र वैवस्वत मनु से कहा और मनु ने अपने पुत्र राजा इक्ष्वाकु से कहा |(1)

Chapter 3 Verses 43

Evam buddheh param buddhwaa samstabhyaatmaanam aatmanaa;
Jahi shatrum mahaabaaho kaamaroopam duraasadam.

43. Thus, knowing Him who is superior to the intellect and restraining the self by the Self, slay thou, O mighty-armed Arjuna, the enemy in the form of desire, hard to conquer!


एवं बुद्धेः परं बुद् ध्वा संस्तभ्यात्मानमात्मना।

जहि शत्रुं महाबाहो कामरूपं दुरासदम्।।43।।

इस प्रकार बुद्धि से पर अर्थात् सूक्ष्म, बलवान और अत्यन्त श्रेष्ठ आत्मा को जानकर और बुद्धि के द्वारा मन को वश में करके हे महाबाहो ! तू इस कामरूप दुर्जय शत्रु को मार डाल |(43)