Glory of the Gita – 9

देहं मानुषमाश्रित्य चातुर्वर्ण्ये तु भारते।

न श्रृणोति पठत्येव ताममृतस्वरूपिणीम्।।37।।

हस्तात्त्याक्तवाऽमृतं प्राप्तं कष्टात्क्ष्वेडं समश्नुते

पीत्वा गीतामृतं लोके लब्ध्वा मोक्षं सुखी भवेत्।।38।।

भरतखण्ड में चार वर्णों में मनुष्य देह प्राप्त करके भी जो अमृतस्वरूप गीता नहीं पढ़ता है या नहीं सुनता है वह हाथ में आया हुआ अमृत छोड़कर कष्ट से विष खाता है | किन्तु जो मनुष्य गीता सुनता है, पढ़ता  तो वह इस लोक में गीतारूपी अमृत का पान करके मोक्ष प्राप्त कर सुखी होता है | (37, 38) 

जनैः संसारदुःखार्तैर्गीताज्ञानं च यैः श्रुतम्।

संप्राप्तममृतं तैश्च गतास्ते सदनं हरेः।।39।।

संसार के दुःखों से पीड़ित जिन मनुष्यों ने गीता का ज्ञान सुना है उन्होंने अमृत प्राप्त किया है और वे श्री हरि के धाम को प्राप्त हो चुके हैं | (39) 

गीतामाश्रित्य बहवो भूभुजो जनकादयः।

निर्धूतकल्मषा लोके गतास्ते परमं पदम्।।40।।

इस लोक में जनकादि की तरह कई राजा गीता का आश्रय लेकर पापरहित होकर परम पद को प्राप्त हुए हैं | (40)

गीतासु न विशेषोऽस्ति जनेषूच्चावचेषु च।

ज्ञानेष्वेव समग्रेषु समा ब्रह्मस्वरूपिणी।।41।।

गीता में उच्च और नीच मनुष्य विषयक भेद ही नहीं हैं, क्योंकि गीता ब्रह्मस्वरूप है अतः उसका ज्ञान सबके लिए समान है | (41)

यः श्रुत्वा नैव गीतार्थं मोदते परमादरात्।

नैवाप्नोति फलं लोके प्रमादाच्च वृथा श्रमम्।।42।।

गीता के अर्थ को परम आदर से सुनकर जो आनन्दवान नहीं होता वह मनुष्य प्रमाद के कारण इस लोक में फल नहीं प्राप्त करता है किन्तु व्यर्थ श्रम ही प्राप्त करता है | (42) 

गीतायाः पठनं कृत्वा माहात्म्यं नैव यः पठेत्।

वृथा पाठफलं तस्य श्रम एव ही केवलम्।।43।।

गीता का पाठ करे जो माहात्म्य का पाठ नहीं करता है उसके पाठ का फल व्यर्थ होता है और पाठ केवल श्रमरूप ही रह जाता है |(43) 

एतन्माहात्म्यसंयुक्तं गीतापाठं करोति यः।

श्रद्धया यः श्रृणोत्येव दुर्लभां गतिमाप्नुयात्।।44।।

इस माहात्म्य के साथ जो गीता पाठ करता है तथा जो श्रद्धा से सुनता है वह दुर्लभ गति को प्राप्त होता है |(44) 

माहात्म्यमेतद् गीताया मया प्रोक्तं सनातनम्।

गीतान्ते च पठेद्यस्तु यदुक्तं तत्फलं लभेत्।।45।।

गीता का सनातन माहात्म्य मैंने कहा है | गीता पाठ के अन्त में जो इसका पाठ करता है वह उपर्युक्त फल को प्राप्त होता है | (45)

इति श्रीवाराहपुराणोद्धृतं श्रीमदगीतामाहात्म्यानुसंधानं समाप्तम् |

इति श्रीवाराहपुराणान्तर्गत श्रीमदगीतामाहात्म्यानुंसंधान समाप्त |

One Response

  1. Can U Ask Me What IS Moksh And What Is Chetanye do U No That
    Aksplan Me

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