Chapter 2 Verses 1

Sanjaya Uvaacha:

Tam tathaa kripayaavishtam ashrupoornaakulekshanam;
Visheedantam idam vaakyam uvaacha madhusoodanah.

Sanjaya said:

1. To him who was thus overcome with pity and who was despondent, with eyes full of tears and agitated, Krishna or Madhusudana (the destroyer of Madhu), spoke these words.

संजय उवाच

तं तथा कृपयाविष्टमश्रुपूर्णाकुलेक्षणम्।

विषीदन्तमिदं वाक्यमुवाच मधुसूदनः।।1।।

संजय बोलेः उस प्रकार करुणा से व्याप्त और आँसूओं से पूर्ण तथा व्याकुल नेत्रों वाले शोकयुक्त उस अर्जुन के प्रति भगवान मधुसूदन ने ये वचन कहा |(1)

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Chapter 2 Verses 2

Sri Bhagavaan Uvaacha:

Kutastwaa kashmalam idam vishame samupasthitam;
Anaaryajushtam aswargyam akeertikaram arjuna.

The Blessed Lord said:

2. Whence is this perilous strait come upon thee, this dejection which is unworthy of thee, disgraceful, and which will close the gates of heaven upon thee, O Arjuna?

श्रीभगवानुवाच

कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम्।

अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यमकीर्तिकरमर्जुन।।2।।

श्री भगवान बोलेः हे अर्जुन ! तुझे इस असमय में यह मोह किस हेतु से प्राप्त हुआ? क्योंकि न तो यह श्रेष्ठ पुरुषों द्वारा आचरित है, न स्वर्ग को देने वाला है और न कीर्ति को करने वाला ही है | इसलिए हे अर्जुन ! नपुंसकता को मत प्राप्त हो, तुझमें यह उचित नहीं जान पड़ती |

Chapter 1 Verses 47

Sanjaya Uvaacha:

Evamuktwaa’rjunah sankhye rathopastha upaavishat;
Visrijya sasharam chaapam shokasamvignamaanasah.

Sanjaya said:

47. Having thus spoken in the midst of the battlefield, Arjuna, casting away his bow and arrow, sat down on the seat of the chariot with his mind overwhelmed with sorrow.

संजय उवाच

एवमुक्तवार्जुनः संख्ये रथोपस्थ उपाविशत्।

विसृज्य सशरं चापं शोकसंविग्नमानसः।।47।।

संजय बोलेः रणभूमि में शोक से उद्विग्न मन वाले अर्जुन इस प्रकार कहकर, बाणसहित धनुष को त्यागकर रथ के पिछले भाग में बैठ गये |(47

Chapter 1 Verses

Hari Om Tat Sat

Iti Srimad Bhagavadgeetaasoopanishatsu Brahmavidyaayaam
Yogashaastre Sri Krishnaarjunasamvaade
Arjunavishaadayogo Naama Prathamo’dhyaayah.

Thus in the Upanishads of the glorious Bhagavad Gita, the science of the Eternal, the scripture of Yoga, the dialogue between Sri Krishna and Arjuna, ends the first discourse entitled:

ॐ तत्सदिति श्रीमदभगवदगीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे

श्रीकृष्णार्जुनसंवादे अर्जुनविषादयोगो नाम प्रथमोऽध्यायः | |1 | |

इस प्रकार उपनिषद, ब्रह्मविद्या तथा योगशास्त्ररूप श्रीमदभगवदगीता के

श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद में अर्जुनविषादयोग नामक प्रथम अध्याय संपूर्ण हुआ |

Chapter 1 Verses 46

Yadi maam aprateekaaram ashastram shastrapaanayah;
Dhaartaraashtraa rane hanyus tanme kshemataram bhavet.

46. If the sons of Dhritarashtra, with weapons in hand, should slay me in battle, unresisting and unarmed, that would be better for me.

यदि मामप्रतीकारमशस्त्रं शस्त्रपाणयः।

धार्तराष्ट्रा रणे हन्युस्तन्मे क्षेमतरं भवेत्।।46।।

यदि मुझ शस्त्ररहित और सामना न करने वाले को शस्त्र हाथ में लिए हुए धृतराष्ट्र के पुत्र रण में मार डालें तो वह मारना भी मेरे लिए अधिक कल्याणकारक होगा | (46)

 

 

 

 

 

 

 

Chapter 1 Verses 45

Aho bata mahat paapam kartum vyavasitaa vayam;
Yadraajya sukhalobhena hantum swajanam udyataah.

45. Alas! We are involved in a great sin in that we are prepared to kill our kinsmen through greed for the pleasures of a kingdom.

अहो बत महत्पापं कर्तुं व्यवसिता वयम्।

यद्राज्यसुखलोभेन हन्तुं स्वजनमुद्यताः।।45।।

हा ! शोक ! हम लोग बुद्धिमान होकर भी महान पाप करने को तैयार हो गये हैं, जो राज्य और सुख के लोभ से स्वजनों को मारने के लिए उद्यत हो गये हैं | (45)

 

 

 

 

 

 

 

Chapter 1 Verses 44

Utsannakuladharmaanaam manushyaanaam janaardana;
Narake’niyatam vaaso bhavateetyanushushruma.

44. We have heard, O Janardana, that inevitable is the dwelling for an unknown period in hell for those men in whose families the religious practices have been destroyed!

उत्सन्कुलधर्माणां मनुष्याणां जनार्दन।

नरकेऽनियतं वासो भवतीत्यनुशुश्रुम।।44।।

हे जनार्दन ! जिनका कुलधर्म नष्ट हो गया है, ऐसे मनुष्यों का अनिश्चित काल तक नरक में वास होता है, ऐसा हम सुनते आये हैं |