Gita Chapter 12 : Mahatmya Story

Lord Shiva said, “I will recite the wonderful glories of the twelfth Chapter of Srimad Bhagavad-gita before you, dear Parvati.”

In the South there is an important holy place by the name of Kolhapur, where the temple of the Lord’s divine consort Maha Lakshmi, is situated. Maha Lakshmi is continuously worshipped by all of the demigods. That place is the fulfiller of all desires. Rudragaya is also situated there. One day, one young prince arrived there. His body was the color of gold. His eyes were very beautiful. His shoulders were very strong and his chest was broad. His arms were long and strong.

When he arrived in Kohlapur, he first went to the lake known as Manikanth-tirth, where he took bath and offered worship to his ancestors. And then he went to the temple of Maha Lakshmi, where he offered his obeisances, and then started to pray, “Oh Devi, Whose heart is full of mercy, Who is worshipped throughout the three worlds and is the giver of all fortune and the Mother of Creation. All glories to You, Oh shelter of all living entities. Oh fulfiller of all desires. You are the wonderful energy of Lord Achyuta, Who is maintaining the three worlds. You are the Supreme Goddess. Oh protector of the devotees. All glories to You. Oh Devi, it is You who fulfills the desires of the devotees, and it is You, who engages them in the service of Lord Achyuta. You are eternal and deliverer of all fallen souls. All glories unto You. Oh Devi, for the welfare and protection of the three worlds, You take on many forms such as Ambika, Brahmi, Vaishnavi, Maheshwari, Varahi Maha-Lakshmi, Narasimhi, Indri, Kumari, Chandika, Lakshmi, Savitri, Chandrakala, Rohini, Parameshwari. All glories unto You, whose glories are unlimited. Kindly be merciful upon me.”

When Maha Lakshmi heard those prayers, She became very pleased and said to the prince, “Oh prince, I am very happy with you, please request any benediction according to your heart’s desire from me.”

That prince said, “Oh Mother of the three worlds, my father King Brahadrathi was performing the famous sacrifice known as Ashwamedha. But before having completed that yajna, he dies due to disease. And before I was able to complete that Ashwamedha yajna, someone stole the horse that had traveled all over the world and had been purified for sacrifice in that Ashwamedha, I sent persons in all directions in search of that horse, but they were unable to find it. Then I took permission from the priest to come and pray for Your help. And, if You are pleased with me, then kindly let me know, how I can get back that horse and complete the fire sacrifice and thus fulfill my father’s desire,”

Maha-Lakshmi said, “Oh noble prince, by the gate of my temple one highly elevated Brahmana lives, who is known by the name of Siddha-Samadhi. He will be able to fulfill your desire.”

When the prince heard these words of Maha-Lakshmi, he went to the place, where Siddha-Samadhi lived and offered obeisances to him. After having offered obeisances, he stood before Siddha-Samadhi silently with fold hands. Siddha Samadhi then said, “You have been sent here by mother Maha Lakshmi, so I will fulfill your desire.”

Then chanting some mantras, Siddha-Samadhi brought all of the demigods before him. The prince at that time saw all of the demigods standing before Siddha Samadhi, awaiting his instructions. Then Siddha-Samadhi said to those demigods, “Oh devas, this prince’s horse, which he had kept ready for his sacrifice, was stolen at night by Lord Indra. Kindly bring that horse back now.”

Immediately those demigods brought that horse before him, after which Siddha-Samadhi dismissed them. When the prince saw all these wonderful happenings, he fell at the feet of Siddha-Samadhi, and inquired from him. “How have you attained such power, which I have not seen or heard of any one else possessing? Oh great sage, kindly hear my request.

My father, king Brihadrathi while beginning the Ashvamedha-sacrifice, died unexpectedly. And thus I kept his body in pure boiled oil. Kindly, if you desire, please bring him back to life.”

Hearing this, Siddha-Samadhi gave a little chuckle, and said, “Let us go to that place, where you have kept your father’s body.” When they reached that place, Siddha-Samadhi took some water in his hand and while chanting some mantras, he sprinkled the water onto the head of the dead body of King Brahadrathi. As soon as that water touched his head, the King sat up and inquired from Siddha- Samadhi, “Oh, great devotee, who are you?” The prince immediately informed his father of all the events, which had taken place. When the King heard that narration, he again and again offered his obeisances to Siddha-Samadhi, and inquired from him, What austerities he had performed to attain such divine powers. Hearing the King’s inquiry, Siddha-Samadhi replied “My dear king Brahadrathi, daily I recite the Twelfth Chapter of Srimad Bhagavad-gita.”

Hearing those words of that great devotee, the king learnt from Siddha-Samadhi the Twelfth Chapter of Srimad Bhagavad-gita. In the course of time, both the king and his son attained the lotus-feet of Lord Krishna. Many other persons have achieved the topmost goal, devotion to Lord Krishna’s lotus-feet, by reciting the Twelfth Chapter of Srimad Bhagavad-gita daily.

बारहवें अध्याय का माहात्म्य

श्रीमहादेवजी कहते हैं पार्वती ! दक्षिण दिशा में कोल्हापुर नामक एक नगर है, जो सब प्रकार के सुखों का आधार, सिद्ध-महात्माओं का निवास स्थान तथा सिद्धि प्राप्ति का क्षेत्र है। वह पराशक्ति भगवती लक्ष्मी की प्रधान पीठ है। सम्पूर्ण देवता उसका सेवन करते हैं। वह पुराणप्रसिद्ध तीर्थ भोग और मोक्ष प्रदान करने वाला है। वहाँ करोड़ो तीर्थ और शिवलिंग हैं। रुद्रगया भी वहाँ है। वह विशाल नगर लोगों में बहुत विख्यात है। एक दिन कोई युवक पुरुष नगर में आया। वह कहीं का राजकुमार था। उसके शरीर का रंग गोरा, नेत्र सुन्दर, ग्रीवा शंख के समान, कंधे मोटे, छाती चौड़ी तथा भुजाएँ बड़ी-बड़ी थीं। नगर में प्रवेश करके सब ओर महलों की शोभा निहारता हुआ वह देवेश्वरी महालक्ष्मी के दर्शनार्थ उत्कण्ठित हो मणिकण्ठ तीर्थ में गया और वहाँ स्नान करके उसने पितरों का तर्पण किया। फिर महामाया महालक्ष्मीजी को प्रणाम करके भक्तिपूर्वक स्तवन करना आरम्भ किया।

राजकुमार बोलाः जिसके हृदय में असीम दया भरी हुई है, जो समस्त कामनाओं को देती तथा अपने कटाक्षमात्र से सारे जगत की रचना, पालन और संहार करती है, उस जगन्माता महालक्ष्मी की जय हो। जिस शक्ति के सहारे उसी के आदेश के अनुसार परमेष्ठी ब्रह्मा सृष्टि रचते हैं, भगवान अच्युत जगत का पालन करते हैं तथा भगवान रुद्र अखिल विश्व का संहार करते हैं, उस सृष्टि, पालन और संहार की शक्ति से सम्पन्न भगवती पराशक्ति का मैं भजन करता हूँ।

कमले ! योगीजन तुम्हारे चरणकमलों का चिन्तन करते रहते हैं। कमलालये ! तुम अपनी स्वाभाविक सत्ता से ही हमारे समस्त इन्द्रियगोचर विषयों को जानती हो। तुम्हीं कल्पनाओं के समूह को तथा उसका संकल्प करने वाले मन को उत्पन्न करती हो। इच्छाशक्ति, ज्ञानशक्ति और क्रियाशक्ति – ये सब तुम्हारे ही रूप हैं। तुम परासंचित (परमज्ञान) रूपिणी हो। तुम्हारा स्वरूप निष्काम, निर्मल, नित्य, निराकार, निरंजन, अन्तरहित, आतंकशून्य, आलम्बहीन तथा निरामय है। देवि ! तुम्हारी महिमा का वर्णन करने में कौन समर्थ हो सकता है? जो षट्चक्रों का भेदन करके अन्तःकरण के बारह स्थानों में विहार करती हैं, अनाहत, ध्वनि, बिन्दु, नाद और कला ये जिसके स्वरूप हैं, उस माता महालक्ष्मी को मैं प्रणाम करता हूँ। माता ! तुम अपने मुखरूपी पूर्णचन्द्रमा से प्रकट होने वाली अमृतराशि को बहाया करती हो। तुम्हीं परा, पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी नामक वाणी हो। मैं तुम्हें नमस्कार करता हूँ। देवी! तुम जगत की रक्षा के लिए अनेक रूप धारण किया करती हो। अम्बिके ! तुम्हीं ब्राह्मी, वैष्णवी, तथा माहेश्वरी शक्ति हो। वाराही, महालक्ष्मी, नारसिंही, ऐन्द्री, कौमारी, चण्डिका, जगत को पवित्र करने वाली लक्ष्मी, जगन्माता सावित्री, चन्द्रकला तथा रोहिणी भी तुम्हीं हो। परमेश्वरी ! तुम भक्तों का मनोरथ पूर्ण करने के लिए कल्पलता के समान हो। मुझ पर प्रसन्न हो जाओ।

उसके इस प्रकार स्तुति करने पर भगवती महालक्ष्मी अपना साक्षात् स्वरूप धारण करके बोलीं – राजकुमार ! मैं तुमसे प्रसन्न हूँ। तुम कोई उत्तम वर माँगो।

राजपुत्र बोलाः माँ ! मेरे पिता राजा बृहद्रथ अश्वमेध नामक महान यज्ञ का अनुष्ठान कर रहे थे। वे दैवयोग से रोगग्रस्त होकर स्वर्गवासी हो गये। इसी बीच में यूप में बँधे हुए मेरे यज्ञसम्बन्धी घोड़े को, जो समूची पृथ्वी की परिक्रमा करके लौटा था, किसी ने रात्रि में बँधन काट कर कहीं अन्यत्र पहुँचा दिया। उसकी खोज में मैंने कुछ लोगों को भेजा था, किन्तु वे कहीं भी उसका पता न पाकर जब खाली हाथ लौट आये हैं, तब मैं ऋत्विजों से आज्ञा लेकर तुम्हारी शरण में आया हूँ। देवी ! यदि तुम मुझ पर प्रसन्न हो तो मेरे यज्ञ का घोड़ा मुझे मिल जाये, जिससे यज्ञ पूर्ण हो सके। तभी मैं अपने पिता जी का ऋण उतार सकूँगा। शरणागतों पर दया करने वाली जगज्जननी लक्ष्मी ! जिससे मेरा यज्ञ पूर्ण हो, वह उपाय करो।

भगवती लक्ष्मी ने कहाः राजकुमार ! मेरे मन्दिर के दरवाजे पर एक ब्राह्मण रहते हैं, जो लोगों में सिद्धसमाधि के नाम से विख्यात हैं। वे मेरी आज्ञा से तुम्हारा सब काम पूरा कर देंगे।

महालक्ष्मी के इस प्रकार कहने पर राजकुमार उस स्थान पर आये, जहाँ सिद्धसमाधि रहते थे। उनके चरणों में प्रणाम करके राजकुमार चुपचाप हाथ जोड़ कर खड़े हो गये। तब ब्राह्मण ने कहाः तुम्हें माता जी ने यहाँ भेजा है। अच्छा, देखो। अब मैं तुम्हारा सारा अभीष्ट कार्य सिद्ध करता हूँ। यों कहकर मन्त्रवेत्ता ब्राह्मण ने सब देवताओं को वही खींचा। राजकुमार ने देखा, उस समय सब देवता हाथ जोड़े थर-थर काँपते हुए वहाँ उपस्थित हो गये। तब उन श्रेष्ठ ब्राह्मण ने समस्त देवताओं से कहाः देवगण ! इस राजकुमार का अश्व, जो यज्ञ के लिए निश्चित हो चुका था, रात में देवराज इन्द्र ने चुराकर अन्यत्र पहुँचा दिया है। उसे शीघ्र ले आओ।

तब देवताओं ने मुनि के कहने से यज्ञ का घोड़ा लाकर दे दिया। इसके बाद उन्होंने उन्हे जाने की आज्ञा दी। देवताओं का आकर्षण देखकर तथा खोये हुए अश्व को पाकर राजकुमार ने मुनि के चरणों में प्रणाम करके कहाः महर्षे ! आपका यह सामर्थ्य आश्चर्यजनक है। आप ही ऐसा कार्य कर सकते हैं, दूसरा कोई नहीं। ब्रह्मन् ! मेरी प्रार्थना सुनिये, मेरे पिता राजा बृहद्रथ अश्वमेध यज्ञ का अनुष्ठान आरम्भ करके दैवयोग से मृत्यु को प्राप्त हो गये हैं। अभी तक उनका शरीर तपाये हुए तेल में सुखाकर मैंने रख छोड़ा है। आप उन्हें पुनः जीवित कर दीजिए।

यह सुनकर महामुनि ब्राह्मण ने किंचित मुस्कराकर कहाः चलो, वहाँ यज्ञमण्डप में तुम्हारे पिता मौजूद हैं, चलें। तब सिद्धसमाधि ने राजकुमार के साथ वहाँ जाकर जल अभिमन्त्रित किया और उसे शव के मस्तक पर रखा। उसके रखते ही राजा सचेत होकर उठ बैठे फिर उन्होंने ब्राह्मण को देखकर पूछाः धर्मस्वरूप ! आप कौन हैं?’ तब राजकुमार ने महाराज से पहले का सारा हाल कह सुनाया। राजा ने अपने को पुनः जीवनदान देने वाले ब्राह्मण को नमस्कार करके पूछाः ब्राह्मण ! किस पुण्य से आपको यह अलौकिक शक्ति प्राप्त हुई है?” उनके यों कहने पर ब्राह्मण ने मधुर वाणी में कहाः राजन ! मैं प्रतिदिन आलस्यरहित होकर गीता के बारहवें अध्याय का जप करता हूँ। उसी से मुझे यह शक्ति मिली है, जिससे तुम्हें जीवन प्राप्त हुआ है। यह सुनकर ब्राह्मणों सहित राजा ने उन महर्षि से उन से गीता के बारहवें अध्याय का अध्ययन किया। उसके माहात्म्य से उन सबकी सदगती  हो गयी। दूसरे-दूसरे जीव भी उसके पाठ से परम मोक्ष को प्राप्त हो चुके हैं।

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