Chapter 4 Verses 19

Yasya sarve samaarambhaah kaamasankalpa varjitaah;
Jnaanaagni dagdhakarmaanam tam aahuh panditam budhaah.

19. He whose undertakings are all devoid of desires and (selfish) purposes, and whose actions have been burnt by the fire of knowledge,—him the wise call a sage.

यस्य सर्वे समारम्भाः कामसंकल्पवर्जिताः।

ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तमाहुः पण्डितं बुधाः।।19।।

जिसके सम्पूर्ण शास्त्र-सम्मत कर्म बिना कामना और संकल्प के होते हैं तथा जिसके समस्त कर्म ज्ञानरूप अग्नि के द्वारा भस्म हो गये हैं, उस महापुरुष को ज्ञानीजन भी पण्डित कहते हैं |(19)

Advertisements

Chapter 4 Verses 18

Karmanyakarma yah pashyed akarmani cha karma yah;
Sa buddhimaan manushyeshu sa yuktah kritsnakarmakrit.

18. He who seeth inaction in action and action in inaction, he is wise among men; he is a Yogi and performer of all actions.

कर्मण्यकर्म यः पश्येदकर्मणि च कर्म यः।

स बुद्धिमान्मनुष्येषु स युक्तः कृत्स्नकर्मकृत्।।18।।

 

जो मनुष्य कर्म में अकर्म देखता और जो अकर्म में कर्म देखता है, वह मनुष्यों में बुद्धिमान है और वह योगी समस्त कर्मों को करने वाला है |(18)

Chapter 4 Verses 17

Karmano hyapi boddhavyam boddhavyam cha vikarmanah;
Akarmanashcha boddhavyam gahanaa karmano gatih.

17. For, verily the true nature of action (enjoined by the scriptures) should be known, also (that) of forbidden (or unlawful) action, and of inaction; hard to understand is the nature (path) of action.

कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं य विकर्मणः।

अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गतिः।।17।।

कर्म का स्वरूप भी जानना चाहिए और अकर्म का स्वरूप भी जानना चाहिए तथा विकर्म का स्वरूप भी जानना चाहिए, क्योंकि कर्म की गति गहन है |(17)

Chapter 4 Verses 16

Kim karma kim akarmeti kavayo’pyatra mohitaah;
Tat te karma pravakshyaami yajjnaatwaa mokshyase’shubhaat.

16. What is action? What is inaction? As to this even the wise are confused. Therefore, I shall teach thee such action (the nature of action and inaction), by knowing which thou shalt be liberated from the evil (of Samsara, the world of birth and death).

किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिताः।

तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्।।16।।

कर्म क्या है? और अकर्म क्या है? – इस प्रकार इसका निर्णय करने में बुद्धिमान पुरुष भी मोहित हो जाते हैं | इसलिए वह कर्मतत्त्व मैं तुझे भली भाँति समझाकर कहूँगा, जिसे जानकर तू अशुभ से अर्थात् कर्मबन्धन से मुक्त हो जाएगा |(16)


Chapter 4 Verses 15

Evam jnaatwaa kritam karma poorvair api mumukshubhih;
Kuru karmaiva tasmaat twam poorvaih poorvataram kritam.

15. Having known this, the ancient seekers after freedom also performed actions; therefore, do thou perform actions as did the ancients in days of yore.

एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वैरपि मुमुक्षुभिः।

कुरु कर्मैव तस्मात्त्वं पूर्वैः पूर्वतरं कृतम्।।15।।

पूर्वकाल में मुमुक्षुओं ने भी इस प्रकार जानकर ही कर्म किये हैं इसलिए तू भी पूर्वजों द्वारा सदा से किये जाने वाले कर्मों को ही कर |(15)



Chapter 4 Verses 14

Na maam karmaani limpanti na me karmaphale sprihaa;
Iti maam yo’bhijaanaati karmabhir na sa badhyate.

14. Actions do not taint Me, nor have I a desire for the fruits of actions. He who knows Me thus is not bound by actions.

न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा।

इति मां योऽभिजानाति कर्मभिर्न स बध्यते।।14।

कर्मों के फल में मेरी स्पृहा नहीं है, इसलिए मुझे कर्म लिप्त नहीं करते – इस प्रकार जो मुझे तत्त्व से जान लेता है, वह भी कर्मों से नहीं बँधता |(14)

Chapter 4 Verses 13

Chaaturvarnyam mayaa srishtam gunakarma vibhaagashah;
Tasya kartaaram api maam viddhyakartaaram avyayam.

13. The fourfold caste has been created by Me according to the differentiation of Guna and Karma; though I am the author thereof, know Me as the non-doer and immutable.

चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः।

तस्य कर्तारमपि मां विद्धयकर्तारमव्ययम्।।13।।

ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र – इन चार वर्णों का समूह, गुण और कर्मों के विभागपूर्वक मेरे द्वारा रचा गया है | इस प्रकार उस सृष्टि – रचनादि कर्म का कर्ता होने पर भी मुझ अविनाशी परमेश्वर को तू वास्तव में अकर्ता ही जान |(13)