Chapter 2 Verses 59

Vishayaa vinivartante niraahaarasya dehinah
Rasavarjam raso’pyasya param drishtwaa nivartate.

59. The objects of the senses turn away from the abstinent man, leaving the longing (behind); but his longing also turns away on seeing the Supreme.

विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः।

रसवर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते।।59।।

इन्द्रियों के द्वारा विषयों को ग्रहण न करने वाले पुरुष के भी केवल विषय तो निवृत्त् हो जाते हैं, परन्तु उनमें रहने वाली आसक्ति निवृत्त नहीं होती | इस स्थितप्रज्ञ पुरुष की तो आसक्ति भी परमात्मा का साक्षात्कार करके निवृत्त हो जाती है | (59)

 

 

Chapter 2 Verses 58

Yadaa samharate chaayam kurmo’ngaaneeva sarvashah;
Indriyaaneendriyaarthebhyas tasya prajnaa pratishthitaa.

58. .When, like the tortoise which withdraws its limbs on all sides, he withdraws his senses from the sense-objects, then his wisdom becomes steady

यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गनीव सर्वशः।

इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता।।58।।

और जैसे कछुवा सब ओर से अपने अंगों को समेट लेता है, वैसे ही जब यह पुरुष इन्द्रियों के विषयों से इन्द्रियों के सब प्रकार से हटा लेता है, तब उसकी बुद्धि स्थिर है | (ऐसा समझना चाहिए) |

 

 

 

Chapter 2 Verses 57

Yah sarvatraanabhisnehas tattat praapya shubhaashubham;
Naabhinandati na dweshti tasya prajnaa pratishthitaa.

57. He who is everywhere without attachment, on meeting with anything good or bad, who neither rejoices nor hates, his wisdom is fixed.

यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम्।

नाभिनन्दति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता।।57।।

 जो पुरुष सर्वत्र स्नेह रहित हुआ उस-उस शुभ या अशुभ वस्तु को प्राप्त होकर न प्रसन्न होता है और न द्वेष करता है उसकी बुद्धि स्थिर है | (57)

Chapter 2 Verses 56

Duhkheshwanudwignamanaah sukheshu vigatasprihah;
Veetaraagabhayakrodhah sthitadheer munir uchyate.

56. He whose mind is not shaken by adversity, who does not hanker after pleasures, and who is free from attachment, fear and anger, is called a sage of steady wisdom.

दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः।

वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते।।56।।

 

 

दुःखों की प्राप्ति होने पर जिसके मन पर उद्वेग नहीं होता, सुखों की प्राप्ति में जो सर्वथा निःस्पृह है तथा जिसके राग, भय और क्रोध नष्ट हो गये हैं, ऐसा मुनि स्थिरबुद्धि कहा जाता है |

 

 

 

Chapter 2 Verses 55

Sri Bhagavaan Uvaacha:

Prajahaati yadaa kaamaan sarvaan paartha manogataan;
Aatmanyevaatmanaa tushtah sthitaprajnastadochyate.

The Blessed Lord said:

55. When a man completely casts off, O Arjuna, all the desires of the mind and is satisfied in the Self by the Self, then is he said to be one of steady wisdom!

श्रीभगवानुवाच

प्रजहाति यदा कामान्सर्वान्पार्थ मनोगतान्।

आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते।।55।।

 

 

श्री भगवान बोलेः हे अर्जुन ! जिस काल में यह पुरुष मन में स्थित सम्पूर्ण कामनाओं को भली भाँति त्याग देता है और आत्मा से आत्मा में ही संतुष्ट रहता है, उस काल में वह स्थितप्रज्ञ कहा जाता है |(55)

 

 

 

Chapter 2 Verses 54

Arjuna Uvaacha:

Sthitaprajnasya kaa bhaashaa samaadhisthasya keshava;
Sthitadheeh kim prabhaasheta kimaaseeta vrajeta kim.

Arjuna said:

54. What, O Krishna, is the description of him who has steady wisdom and is merged in the Superconscious State? How does one of steady wisdom speak? How does he sit? How does he walk?

अर्जुन उवाच

स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव।

स्थितधीः किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम्।।54।।

अर्जुन बोले हे केशव ! समाधि में स्थित परमात्मा को प्राप्त हुए स्थिरबुद्धि पुरुष का क्या लक्षण है? वह स्थिरबुद्धि पुरुष कैसे बोलता है, कैसे बैठता है और कैसे चलता है?(54)

Chapter 2 Verses 53

Shrutivipratipannaa te yadaa sthaasyati nishchalaa;
Samaadhaavachalaa buddhistadaa yogam avaapsyasi.

53. When thy intellect, perplexed by what thou hast heard, shall stand immovable and steady in the Self, then thou shalt attain Self-realisation.

श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला।

समाधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसि।।53।।

 

 

भाँति-भाँति के वचनों को सुनने से विचलित हुई तेरी बुद्धि जब परमात्मा में अचल और स्थिर ठहर जायेगी, तब तू योग को प्राप्त हो जायेगा अर्थात् तेरा परमात्मा से नित्य संयोग हो जायेगा |