Gita Chapter 9 : Mahatmya Story

Lord Shiva said. “My dear Parvati, now I will relate to you the glories of the Ninth Chanter of Srimad Bhagavad-gita.

There was a town of the name Mahismati on the bank of the Narmada River, where one brahmana of the name Madhava lived. That brahmana very strictly followed all the injunctions of the Vedas, and possessed all the good qualities of the brahminical class. Due to his being so learned, he would receive a lot of charity. And with his accumulated wealth, he started to perform a great fire-sacrifice. For offering in sacrifice, one goat was bought, and when they started to cleanse that goat in preparation for it’s sacrifice, to everyone’s great surprise the goat started to laugh and in a loud voice said; “Oh, brahmana, what is the benefit of performing so many fire-sacrifices that simply bind us up in the wheel of birth and death. Just see my position due to my performing so many fire-sacrifices.”

When everyone gathered there heard the words of the goat, they became curious, and that brahmana inquired with folded hands, “how did you become goat? In your previous life, which caste did you belong to and what activities did you perform?” The goat replied, “Oh, brahmana, in my previous birth I was born in a very pure brahmana family and I very carefully performed all the ritualistic activities enjoined in the Vedas.

One day my wife wished to worship Durga, so that our child might be cured of his disease, for this purpose she requested me to bring one goat. When we sacrificed the goat at the temple of Mother Durga; the goat cursed me, “Oh, sinful, lowest of all, you wish to make my children fatherless. For this reason you will also take birth as a goat.” Oh, Madhava, when the time for my death came I attained this body of a goat but by the grace of Lord Govinda I can remember my previous births. If you wish to hear one other interesting story then I will tell you.

In the place known as Kurukshetra which is capable of giving liberation, there once lived a king of the name Chandrasharma, who was in the dynasty of the sun-god. Once, at the time of the solar-eclipse, the king wished to give charity to one brahmana. Included in that charity was a Sudra, whose body was completely black. After going with his priest and taking bath in the sacred lake, putting on clean cloth and applying sandalwood, he returned to his place. With devotion he gave charity to a qualified Brahmana. After he had presented the charity, all of a sudden from that black Sudras’s heart, one very sinful chandala (dog-eater) appeared and after a little while, a female chandala appeared from that black sudras’s body, and together they went close to the brahmana. 

All of a sudden they entered in to the body of the brahmana. That brahmana remained undisturbed and started to chant the Ninth Chapter of Srimad Bhagavad-gita, while remembering Lord Govinda. The king witnessing all these activities was stunned, unable to say anything. As soon as the words of the Ninth Chapter of Srimad Bhagavad-gita came on the lips of that brahmana, the Vishnudutas appeared there and chased away those two chandalas. At that time the king inquired from the brahmana, “Oh, learned one, who were those two persons and which mantra did you chant? Which deity did you remember?” The brahmana replied, “Taking the form of a chandala, sin personified appeared, along with offense personified in the form of that female chandala. At that time I started chanting the Ninth Chapter of Srimad Bhagavad-gita, which is capable of releasing one from all fearful situations. By reciting the Ninth Chapter of Srimad Bhagavad-gita, I am always able to remember the lotus-feet of Lord Govinda”.

Upon hearing this the king learned the chanting of the Srimad Bhagavad-gita, Ninth Chapter, from the brahmana. Gradually he managed to attain the lotus-feet of Lord Govinda. When Madhava heard this discourse from the goat, he immediately freed the goat and started to engage in reciting the Ninth Chapter of Srimad Bhagavad-gita daily and thus he also gained the lotus-feet of Lord Govinda.

नौवें अध्याय का माहात्म्य

महादेवजी कहते हैं पार्वती अब मैं आदरपूर्वक नौवें अध्याय के माहात्म्य का वर्णन करुँगा, तुम स्थिर होकर सुनो। नर्मदा के तट पर माहिष्मती नाम की एक नगरी है। वहाँ माधव नाम के एक ब्राह्मण रहते थे, जो वेद-वेदांगों के तत्वज्ञ और समय-समय पर आने वाले अतिथियों के प्रेमी थे। उन्होंने विद्या के द्वारा बहुत धन कमाकर एक महान यज्ञ का अनुष्ठान आरम्भ किया। उस यज्ञ में बलि देने के लिए एक बकरा मंगाया गया। जब उसके शरीर की पूजा हो गयी, तब सबको आश्चर्य में डालते हुए उस बकरे ने हँसकर उच्च स्वर से कहाः ब्राह्मण ! इन बहुत से यज्ञों द्वारा क्या लाभ है? इनका फल तो नष्ट हो जाने वाला  तथा ये जन्म, जरा और मृत्यु के भी कारण हैं। यह सब करने पर भी मेरी जो वर्तमान दशा है इसे देख लो।बकरे के इस अत्यन्त कौतूहलजनक वचन को सुनकर यज्ञमण्डप में रहने वाले सभी लोग बहुत ही विस्मित हुए। तब वे यजमान ब्राह्मण हाथ जोड़ अपलक नेत्रों से देखते हुए बकरे को प्रणाम करके यज्ञ और आदर के साथ पूछने लगे।

ब्राह्मण बोलेः आप किस जाति के थे? आपका स्वभाव और आचरण कैसा था? तथा जिस कर्म से आपको बकरे की योनि प्राप्त हुई? यह सब मुझे बताइये।

बकरा बोलाः ब्राह्मण ! मैं पूर्व जन्म में ब्राह्मणों के अत्यन्त निर्मल कुल में उत्पन्न हुआ था। समस्त यज्ञों का अनुष्ठान करने वाला और वेद-विद्या में प्रवीण था। एक दिन मेरी स्त्री ने भगवती दुर्गा की भक्ति से विनम्र होकर अपने बालक के रोग की शान्ति के लिए बलि देने के निमित्त मुझसे एक बकरा माँगा। तत्पश्चात् जब चण्डिका के मन्दिर में वह बकरा मारा जाने लगा, उस समय उसकी माता ने मुझे शाप दियाः ओ ब्राह्मणों में नीच, पापी! तू मेरे बच्चे का वध करना चाहता है, इसलिए तू भी बकरे की योनि में जन्म लेगा। द्विजश्रेष्ठ ! तब कालवश मृत्यु को प्राप्त होकर मैं बकरा हुआ। यद्यपि मैं पशु योनि में पड़ा हूँ, तो भी मुझे अपने पूर्वजन्मों का स्मरण बना हुआ है। ब्रह्मण ! यदि आपको सुनने की उत्कण्ठा हो तो मैं एक और भी आश्चर्य की बात बताता हूँ। कुरुक्षेत्र नामक एक नगर है, जो मोक्ष प्रदान करने वाला है। वहाँ चन्द्रशर्मा नामक एक सूर्यवंशी राजा राज्य करते थे। एक समय जब सूर्यग्रहण लगा था, राजा ने बड़ी श्रद्धा के साथ कालपुरुष का दान करने की तैयारी की। उन्होंने वेद-वेदांगो के पारगामी एक विद्वान ब्राह्मण को बुलवाया और पुरोहित के साथ वे तीर्थ के पावन जल से स्नान करने को चले और दो वस्त्र धारण किये। फिर पवित्र और प्रसन्नचित्त होकर उन्होंने श्वेत चन्दन लगाया और बगल में खड़े हुए पुरोहित का हाथ पकड़कर तत्कालोचित मनुष्यों से घिरे हुए अपने स्थान पर लौट आये। आने पर राजा ने यथोचित्त विधि से भक्तिपूर्वक ब्राह्मण को कालपुरुष का दान किया।

तब कालपुरुष का हृदय चीरकर उसमें से एक पापात्मा चाण्डाल प्रकट हुआ फिर थोड़ी देर के बाद निन्दा भी चाण्डाली का रूप धारण करके कालपुरुष के शरीर से निकली और ब्राह्मण के पास आ गयी। इस प्रकार चाण्डालों की वह जोड़ी आँखें लाल किये निकली और ब्राह्मण के शरीर में हठात प्रवेश करने लगी। ब्राह्मण मन ही मन गीता के नौवें अध्याय का जप करते थे और राजा चुपचाप यह सब कौतुक देखने लगे। ब्राह्मण के अन्तःकरण में भगवान गोविन्द शयन करते थे। वे उन्हीं का ध्यान करने लगे। ब्राह्मण ने जब गीता के नौवें अध्याय का जप करते हुए अपने आश्रयभूत भगवान का ध्यान किया, उस समय गीता के अक्षरों से प्रकट हुए विष्णुदूतों द्वारा पीड़ित होकर वे दोनों चाण्डाल भाग चले। उनका उद्योग निष्फल हो गया। इस प्रकार इस घटना को प्रत्यक्ष देखकर राजा के नेत्र आश्चर्य से चकित हो उठे। उन्होंने ब्राह्मण से पूछाः विप्रवर ! इस भयंकर आपत्ति को आपने कैसे पार किया? आप किस मन्त्र का जप तथा किस देवता का स्मरण कर रहे थे? वह पुरुष तथा स्त्री कौन थी? वे  दोनों कैसे उपस्थित हुए? फिर वे शान्त कैसे हो गये? यह सब मुझे बताइये।

ब्राह्मण ने कहाः राजन ! चाण्डाल का रूप धारण करके भयंकर पाप ही प्रकट हुआ था तथा वह स्त्री निन्दा की साक्षात मूर्ति थी। मैं इन दोनों को ऐसा ही समझता हूँ। उस समय मैं गीता के नवें अध्याय के मन्त्रों की माला जपता था। उसी का माहात्म्य है कि सारा संकट दूर हो गया। महीपते ! मैं नित्य ही गीता के नौवें अध्याय का जप करता हूँ। उसी के प्रभाव से प्रतिग्रहजनित आपत्तियों के पार हो सका हूँ।

यह सुनकर राजा ने उसी ब्राह्मण से गीता के नवम अध्याय का अभ्यास किया, फिर वे दोनों ही परम शान्ति (मोक्ष) को प्राप्त हो गये।

(यह कथा सुनकर ब्राह्मण ने बकरे को बन्धन से मुक्त कर दिया और गीता के नौवें अध्याय के अभ्यास से परम गति को प्राप्त किया।)

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s

%d bloggers like this: