Gita Chapter 8 : Mahatmya Story

Lord Shiva said, “My dear Parvati, now please listen to the glories of the Eighth Chapter of Srimad Bhagavad-gita. After listening to this, you will feel great joy.

In the South is an important town of the name Amardhkapur in which one brahmana of the name Bhavasharma lived, who had taken a prostitute as his wife. Bhavasharma enjoyed eating meat, drinking wine, stealing, going with other’s wives; and hunting. One day, that sinful Bhavasharma was invited to a party, where he drank so much alcohol that it started to come out of his mouth. After the party, he became very sick and suffered from chronic dysentery, and after many days of suffering he died and attained the body of a date-palm-tree.

One day, two brahma-rakshasas (ghosts) came and took shelter under that tree. Their previous life-story was as follows:

There was a brahmana by the name of Kushibal, who was very learned in the Vedas and had studied all branches of knowledge. His wife’s name was Kumati, who was very evil-minded. Although that brahmana was very learned, he was also very greedy. Along with his wife, he used to collect lots of charity everyday, but he would never give charity to any other Brahmana, When their time came to die, they both attained the forms of brahma-rakshasas. As brahma-rakshasas, they continuously wandered here and there over the earth suffering from hunger and thirst.

One day they rested under that date-palm-tree. At that time, the wife inquired from the husband “How can we get free from this curse of being brahma-rakshasas?” He replied, “By knowledge of Brahma, by knowledge of the Self, by knowledge of fruitive activities. Without such knowledge it is not possible to get free from our sinful reactions.”

Upon hearing this, the wife inquired, “Oh, my Lord, what is Brahma, what is the Self? What are fruitive activities?  (him tad brahma kim adhyatmam kim karma purusottama)”‘Completely by accident, the wife happened to chant half of the first shloka of the Eighth Chapter of Srimad Bhagavad-gita. At that time, having heard that half shloka, Bhavasharma broke free from that form as a tree, and again attained a body of a brahmana, completely free from all sin. Suddenly from the sky came a flower-airplane, which took that husband and wife back home, back to Godhead, Vaikuntha.

Afterwards, that Brahmana, Bhavasharma, with great respect, wrote down that half Shloka (kim tad brahma kim adhyatmam-kim karma purusottama) and with the intention of worshipping Lord Krishna, he went to Kashipuri and started performing great austerities, while continuously chanting that half Shloka.

Meanwhile in Vaikuntha, Lakshmi seeing Lord Vishnu, had risen suddenly from taking rest, inquired with folded hands “Why have You risen so suddenly from Your sleep?” Lord Vishnu said, “My dear Lakshmi, in Kashipuri, on the bank of the river Ganges, my devotee is performing great austerities continuously chanting half a Shloka of the Eighth Chapter of Srimad Bhagavad-gita. For a long time I have been thinking how to award his devotion”. Parvati inquired from Lord Shiva, “when Lord Vishnu was so pleased with His devotee, what benediction did He bestow upon him?”

Lord Shiva said, “Bhavasharma went to Vaikuntha, to engage in the eternal service of the lotus-feet of Lord Vishnu. Not only that, but all of his ancestors also attained the lotus feet of Lord Vishnu.

My dear Parvati, I have described to you just a little of the glories of the Eighth Chapter of Srimad Bhagavad-gita.

आठवें अध्याय का माहात्म्य

भगवान शिव कहते हैं देवि ! अब आठवें अध्याय का माहात्म्य सुनो | उसके सुनने से तुम्हें बड़ी प्रसन्नता होगी | लक्ष्मीजी के पूछने पर भगवान विष्णु ने उन्हें इस प्रकार अष्टम् अध्याय का माहात्म्य बतलाया था |

दक्षिण में आमर्दकपुर नामक एक प्रसिद्ध नगर है | वहाँ भावशर्मा नामक एक ब्राह्मण रहता था, जिसने वेश्या को पत्नी बना कर रखा था | वह मांस खाता था, मदिरा पीता, श्रेष्ठ पुरुषों का धन चुराता, परायी स्त्री से व्यभिचार करता और शिकार खेलने में दिलचस्पी रखता था | वह बड़े भयानक स्वभाव का था और और मन में बड़े-बड़े हौंसले रखता था | एक दिन मदिरा पीने वालों का समाज जुटा था | उसमें भावशर्मा ने भरपेट ताड़ी पी, खूब गले तक उसे चढ़ाया | अतः अजीर्ण से अत्यन्त पीड़ित होकर वह पापात्मा कालवश मर गया और बहुत बड़ा ताड़ का वृक्ष हुआ | उसकी घनी और ठंडी छाया का आश्रय लेकर ब्रह्मराक्षस भाव को प्राप्त हुए कोई पति-पत्नी वहाँ रहा करते थे |

उनके पूर्व जन्म की घटना इस प्रकार है | एक कुशीबल नामक ब्राह्मण था, जो वेद-वेदांग के तत्त्वों का ज्ञाता, सम्पूर्ण शास्त्रों के अर्थ का विशेषज्ञ और सदाचारी था | उसकी स्त्री का नाम कुमति था | वह बड़े खोटे विचार की थी | वह ब्राह्मण विद्वान होने पर भी अत्यन्त लोभवश अपनी स्त्री के साथ प्रतिदिन भैंस, कालपुरुष और घोड़े आदि दानों को ग्रहण किया करते था, परन्तु दूसरे ब्राह्मणों को दान में मिली हुई कौड़ी भी नहीं देता था | वे ही दोनों पति-पत्नी कालवश मृत्यु को प्राप्त होकर ब्रह्मराक्षस हुए | वे भूख और प्यास से पीड़ित हो इस पृथ्वी पर घूमते हुए उसी ताड वृक्ष के पास आये और उसके मूल भाग में विश्राम करने लगे | इसके बाद पत्नी ने पति से पूछाः नाथ ! हम लोगों का यह महान दुःख कैसे दूर होगा? ब्रह्मराक्षस-योनि से किस प्रकार हम दोनों की मुक्ति होगी? तब उस ब्राह्मण ने कहाः ब्रह्मविद्या के उपदेश, आध्यात्मतत्व के विचार और कर्मविधि के ज्ञान बिना किस प्रकार संकट से छुटकारा मिल सकता है?

यह सुनकर पत्नी ने पूछाः किं तद् ब्रह्म किमध्यात्मं किं कर्म पुरुषोत्तम (पुरुषोत्तम ! वह ब्रह्म क्या है? अध्यात्म क्या है और कर्म कौन सा है?) उसकी पत्नी इतना कहते ही जो आश्चर्य की घटना घटित हुई, उसको सुनो | उपर्युक्त वाक्य गीता के आठवें अध्याय का आधा श्लोक था | उसके श्रवण से वह वृक्ष उस समय ताड के रूप को त्यागकर भावशर्मा नामक ब्राह्मण हो गया | तत्काल ज्ञान होने से विशुद्धचित्त होकर वह पाप के चोले से मुक्त हो गया तथा उस आधे श्लोक के ही माहात्म्य से वे पति-पत्नी भी मुक्त हो गये | उनके मुख से दैवात् ही आठवें अध्याय का आधा श्लोक निकल पड़ा था | तदनन्तर आकाश से एक दिव्य विमान आया और वे दोनों पति-पत्नी उस विमान पर आरूढ़ होकर स्वर्गलोक को चले गये | वहाँ का यह सारा वृत्तान्त अत्यन्त आश्चर्यजनक था |

उसके बाद उस बुद्धिमान ब्राह्मण भावशर्मा ने आदरपूर्वक उस आधे श्लोक को लिखा और देवदेव जनार्दन की आराधना करने की इच्छा से वह मुक्तिदायिनी काशीपुरी में चला गया | वहाँ उस उदार बुद्धिवाले ब्राह्मण ने भारी तपस्या आरम्भ की | उसी समय क्षीरसागर की कन्या भगवती लक्ष्मी ने हाथ जोड़कर देवताओं के भी देवता जगत्पति जनार्दन से पूछाः नाथ ! आप सहसा नींद त्याग कर खड़े क्यों हो गये?”

श्री भगवान बोलेः देवि ! काशीपुरी में भागीरथी के तट पर बुद्धिमान ब्राह्मण भावशर्मा मेरे भक्तिरस से परिपूर्ण होकर अत्यन्त कठोर तपस्या कर रहा है | वह अपनी इन्द्रियों के वश में करके गीता के आठवें अध्याय के आधे श्लोक का जप करता है | मैं उसकी तपस्या से बहुत संतुष्ट हूँ | बहुत देर से उसकी तपस्या के अनुरूप फल का विचार का रहा था | प्रिये ! इस समय वह फल देने को मैं उत्कण्ठति हूँ |

पार्वती जी ने पूछाः भगवन ! श्रीहरि सदा प्रसन्न होने पर भी जिसके लिए चिन्तित हो उठे थे, उस भगवद् भक्त भावशर्मा ने कौन-सा फल प्राप्त किया?

श्री महादेवजी बोलेः देवि ! द्विजश्रेष्ठ भावशर्मा प्रसन्न हुए भगवान विष्णु के प्रसाद को पाकर आत्यन्तिक सुख (मोक्ष) को प्राप्त हुआ तथा उसके अन्य वंशज भी, जो नरक यातना में पड़े थे, उसी के शुद्ध कर्म से भगवद्धाम को प्राप्त हुए | पार्वती ! यह आठवें अध्याय का माहात्म्य थोड़े में ही तुम्हे बताया है | इस पर सदा विचार करना चाहिए |

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