Gita Chapter 4 : Mahatmya Story

Lord Vishnu said, “My dear Lakshmi, now I will describe the glories of the Fourth Chapter of the Srimad Bhagavad-gita.

On the bank of the river Ganges there is a town of the name Kasi, (Banaras), where at the temple of Vishvanath, a great saint of the name Bharata lived. Daily with the greatest devotion, he would recite the fourth Chapter of Srimad Bhagavad-gita. Previously, when Bharat had been traveling on pilgrimage he had gone to the town of Tapodan to take darshan of the Deity of Lord Krishna there. While leaving that town, he saw two Bael fruit trees. Deciding to take rest under the shade of those trees, he lay down, using the root of one of the tree as a pillow, and a root of the other to rest his feet upon.

After some time, when Bharat left from that place, those two trees started to dry up. Within five or six days both trees completely dried up and died. The two souls, who had been living in those trees, took their next birth as the daughters of a very pious Brahmana. Once, when those girls had reached the age of seven years, they had gone on pilgrimage to Kasi (Banaras). While wandering in Kasi, they happened to see the great sage Bharata. When they saw Bharata Maharaja they immediately went and fell at his feet and in sweet words said, “Oh. Maharaja Bharat, due to your mercy we both became freed from the tree form of life.” When Bharata Maharaja heard their statement, he became surprised. He inquired from them, “My dear daughters, where and when did I come in contact with you, and free you from the form of trees? Also kindly inform me, how you attained the form of trees? Because I do not know anything of this matter.” Thereafter, those two girls first informed Bharata Maharaja the reason for their attaining the form of trees.

The two girls said, “Maharaja, on the bank of the river Godavari there is a sacred place of the name Chinnapaap. At that place, there was a rishi of the name, Sachatapa. He was performing very great and difficult austerities. In the hot season he would sit in between many fires, and in the cold season, he would stand in the cold river. In the course of time, he became completely pure, and had complete control of his senses, and slowly he attained the Lotus-Feet of the Supreme Personality of Godhead, Lord Krishna. Lord Brahma started visiting daily to take the darshan of Sachatapa and put questions before him about the devotional service of Lord Krishna. Lord Indra meanwhile, was becoming very worried seeing the elevated position of Sachatapa, thinking that he might one day usurp his own position as king of heaven. At that time, Lord Indra called the two of us, who in that birth were apsaras in the heavenly kingdom, an instructed us, ‘Go and cause the fall down of Sachatapa, before he tries to usurp me from my position.”

After receiving Lord Indra’s instructions, we left from his presence and went to the bank of the Godavari River, where Sachatapa was performing austerities. At that place, we both started to sing and dance very provocatively close to Sachatapa, with the intention of causing that sage to engage in a sexual relationship with us. While dancing, our covering cloth slipped down and our breasts became visible. At that time, taking water in his hand, that sage cursed us in the following words.

“You both go and become Bael trees on the bank of the river Ganga.” upon hearing his curse, we both fell at his feet and begged his forgiveness. “My dear sage, please forgive us, for we are simply the servants of Lord Indra.” Seeing our submissive attitude that sage became pleased and informed us that we would remain as trees until Maharaja Bharata came in contact with us. And he also blessed us, that we would be able to, remember our previous births.

“My dear Maharaja Bharata at the time when you visited Tapodan, you rested beneath us. When we were in the form of Bael trees, you were reciting the Fourth Chapter of Srimad Bhagavad-gita, and by hearing that recitation, we not only became free from that tree form of life and attained birth in a devotee family, also we lost all desire for enjoying in this material world.”

Lord Vishnu said, “My dear Lakshmi, when those two girls recited their history before Bharata Maharaja, he became very happy, and left for his ashram. Those two girls throughout their life carefully recited the Fourth Chapter of Srimad Bhagavad-gita daily and attained devotion to My lotus-feet.”

चौथे अध्याय का माहात्म्य

श्रीभगवान कहते हैं- प्रिये ! अब मैं चौथे अध्याय का माहात्म्य बतलाता हूँ, सुनो | भागीरथी के तट पर वाराणसी(बनारस) नाम की एक पुरी है | वहाँ विश्वनाथजी के मन्दिर में भरत नाम के एक योगनिष्ठ महात्मा रहते थे, जो प्रतिदिन आत्मचिन्तन में तत्पर हो आदरपूर्वक गीता के चतुर्थ अध्याय का पाठ किया करते थे | उसके अभ्यास से उनका अन्तःकरण निर्मल हो गया था | वे शीत-उष्ण आदि द्वन्द्वों से कभी व्यथित नहीं होते थे |

एक समय की बात है | वे तपोधन नगर की सीमा में स्थित देवताओं का दर्शन करने की इच्छा से भ्रमण करते हुए नगर से बाहर निकल गये | वहाँ बेर के दो वृक्ष थे | उन्हीं की जड़ में वे विश्राम करने लगे | एक वृक्ष की जड़ मे उन्होंने अपना मस्तक रखा था और दूसरे वृक्ष के मूल में उनका पैर टिका हुआ था | थोड़ी देर बाद जब वे तपस्वी चले गये, तब बेर के वे दोनों वृक्ष पाँच-छः दिनों के भीतर ही सूख गये | उनमें पत्ते और डालियाँ भी नहीं रह गयीं | तत्पश्चात् वे दोनों वृक्ष कहीं ब्राह्मण के पवित्र गृह में दो कन्याओं के रूप में उत्पन्न हुए |

वे दोनों कन्याएँ जब बढ़कर सात वर्ष की हो गयीं, तब एक दिन उन्होंने दूर देशों से घूमकर आते हुए भरतमुनि को देखा | उन्हें देखते ही वे दोनों उनके चरणों में पड़ गयी और मीठी वाणी में बोलीं- मुने ! आपकी ही कृपा से हम दोनों का उद्धार हुआ है | हमने बेर की योनि त्यागकर मानव-शरीर प्राप्त किया है | उनके इस प्रकार कहने पर मुनि को बड़ा विस्मय हुआ | उन्होंने पूछाः पुत्रियो ! मैंने कब और किस साधन से तुम्हें मुक्त किया था? साथ ही यह भी बताओ कि तुम्हारे बेर होने के क्या कारण था? क्योंकि इस विषय में मुझे कुछ भी ज्ञान नहीं है |

तब वे कन्याएँ पहले उन्हे अपने बेर हो जाने का कारण बतलाती हुई बोलीं- मुने ! गोदावरी नदी के तट पर छिन्नपाप नाम का एक उत्तम तीर्थ है, जो मनुष्यों को पुण्य प्रदान करने वाला है | वह पावनता की चरम सीमा पर पहुँचा हुआ है | उस तीर्थ में सत्यतपा नामक एक तपस्वी बड़ी कठोर तपस्या कर रहे थे | वे ग्रीष्म ऋतु में प्रज्जवलित अग्नियों के बीच में बैठते थे, वर्षाकाल में जल की धाराओं से उनके मस्तक के बाल सदा भीगे ही रहते थे तथा जाड़े के समय में जल में निवास करने के कारण उनके शरीर में हमेशा रोंगटे खड़े रहते थे | वे बाहर भीतर से सदा शुद्ध रहते, समय पर तपस्या करते तथा मन और इन्द्रियों को संयम में रखते हुए परम शान्ति प्राप्त करके आत्मा में ही रमण करते थे | वे अपनी विद्वत्ता के द्वारा जैसा व्याख्यान करते थे, उसे सुनने के लिए साक्षात् ब्रह्मा जी भी प्रतिदिन उनके पास उपस्थित होते और प्रश्न करते थे | ब्रह्माजी के साथ उनका संकोच नहीं रह गया था, अतः उनके आने पर भी वे सदा तपस्या में मग्न रहते थे |

परमात्मा के ध्यान में निरन्तर संलग्न रहने के कारण उनकी तपस्या सदा बढ़ती रहती था | सत्यतपा को जीवन्मुक्त के समान मानकर इन्द्र को अपने समृद्धिशाली पद के सम्बन्ध में कुछ भय हुआ, तब उन्होंने उनकी तपस्या में सैंकड़ों विघ्न डालने आरम्भ किये | अप्सराओं के समुदाय से हम दोनों को बुलाकर इन्द्र ने इस प्रकार आदेश दियाः तुम दोनों उस तपस्वी की तपस्या में विघ्न डालो, जो मुझे इन्द्रपद से हटाकर स्वयं स्वर्ग का राज्य भोगना चाहता है |

इन्द्र का यह आदेश पाकर हम दोनों उनके सामने से चलकर गोदावरी के तीर पर, जहाँ वे मुनि तपस्या करते थे, आयीं | वहाँ मन्द और गम्भीर स्वर से बजते हुए मृदंग तथा मधुर वेणुनाद के साथ हम दोनों ने अन्य अप्सराओं सहित मधुर स्वर में गाना आरम्भ किया | इतना ही नहीं उन योगी महात्मा को वश में करने के लिए हम लोग स्वर, ताल और लय के साथ नृत्य भी करने लगीं | बीच-बीच में जरा-जरा सा अंचल खिसकने पर उन्हें हमारी छाती भी दिख जाती थी | हम दोनों की उन्मत्त गति कामभाव का उद्दीपन करनेवाली थी, किंतु उसने उन निर्विकार चित्तवाले महात्मा के मन में क्रोध का संचार कर दिया | तब उन्होंने हाथ से जल छोड़कर हमें क्रोधपूर्वक शाप दियाः अरी ! तुम दोनों गंगाजी के तट पर बेर के वृक्ष हो जाओ |

यह सुनकर हम लोगों ने बड़ी विनय के साथ कहाः महात्मन् ! हम दोनों पराधीन थीं, अतः हमारे द्वारा जो दुष्कर्म बन गया है उसे आप क्षमा करें | यों कह कर हमने मुनि को प्रसन्न कर लिया | तब उन पवित्र चित्तवाले मुनि ने हमारे शापोद्धार की अवधि निश्चित करते हुए कहाः भरतमुनि के आने तक ही तुम पर यह शाप लागू होगा | उसके बाद तुम लोगों का मृत्युलोक में जन्म होगा और पूर्वजन्म की स्मृति बनी रहेगी |1

मुने ! जिस समय हम दोनों बेर-वृक्ष के रूप में खड़ी थीं, उस समय आपने हमारे समीप आकर गीता के चौथे अध्याय का जप करते हुए हमारा उद्धार किया था, अतः हम आपको प्रणाम करती हैं | आपने केवल शाप ही से नहीं, इस भयानक संसार से भी गीता के चतुर्थ अध्याय के पाठ द्वारा हमें मुक्त कर दिया |

श्रीभगवान कहते हैं- उन दोनों के इस प्रकार कहने पर मुनि बहुत ही प्रसन्न हुए और उनसे पूजित हो विदा लेकर जैसे आये थे, वैसे ही चले गये तथा वे कन्याएँ भी बड़े आदर के साथ प्रतिदिन गीता के चतुर्थ अध्याय का पाठ करने लगीं, जिससे उनका उद्धार हो गया |

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