मलनिर्मोचनं पुंसां जलस्नानं दिने दिने।
सकृद् गीताम्भसि स्नानं संसारमलनाशनम्।।11।।
हर रोज जल से किया हुआ स्नान मनुष्यों का मैल दूर करता है किन्तु गीतारूपी जल में एक बार किया हुआ स्नान भी संसाररूपी मैल का नाश करता है |(11)
गीताशास्त्रस्य जानाति पठनं नैव पाठनम्।
परस्मान्न श्रुतं ज्ञानं श्रद्धा न भावना।।12।।
स एव मानुषे लोके पुरुषो विड्वराहकः।
यस्माद् गीतां न जानाति नाधमस्तत्परो जनः।।13।।
जो मनुष्य स्वयं गीता शास्त्र का पठन-पाठन नहीं जानता है, जिसने अन्य लोगों से वह नहीं सुना है, स्वयं को उसका ज्ञान नहीं है, जिसको उस पर श्रद्धा नहीं है, भावना भी नहीं है, वह मनुष्य लोक में भटकते हुए शूकर जैसा ही है | उससे अधिक नीच दूसरा कोई मनुष्य नहीं है, क्योंकि वह गीता को नहीं जानता है |
धिक् तस्य ज्ञानमाचारं व्रतं चेष्टां तपो यशः।
गीतार्थपठनं नास्ति नाधमस्तत्परो जन।।14।।
जो गीता के अर्थ का पठन नहीं करता उसके ज्ञान को, आचार को, व्रत को, चेष्टा को, तप को और यश को धिक्कार है | उससे अधम और कोई मनुष्य नहीं है |(14)
गीतागीतं न यज्ज्ञानं तद्विद्धयासुरसंज्ञकम्।
तन्मोघं धर्मरहितं वेदवेदान्तगर्हितम्।।15।।
जो ज्ञान गीता में नहीं गाया गया है वह वेद और वेदान्त में निन्दित होने के कारण उसे निष्फल, धर्मरहित और आसुरी जानें |
योऽधीते सततं गीतां दिवारात्रौ यथार्थतः।
स्वपन्गच्छन्वदंस्तिष्ठञ्छाश्वतं मोक्षमाप्नुयात्।।16।।
जो मनुष्य रात-दिन, सोते, चलते, बोलते और खड़े रहते हुए गीता का यथार्थतः सतत अध्ययन करता है वह सनातन मोक्ष को प्राप्त होता है |(16)
योगिस्थाने सिद्धपीठे शिष्टाग्रे सत्सभासु च।
यज्ञे च विष्णुभक्ताग्रे पठन्याति परां गतिम्।।17।।
योगियों के स्थान में, सिद्धों के स्थान में, श्रेष्ठ पुरुषों के आगे, संतसभा में, यज्ञस्थान में और विष्णुभक्तोंके आगे गीता का पाठ करने वाला मनुष्य परम गति को प्राप्त होता है |(17)
गीतापाठं च श्रवणं यः करोति दिने दिने।
क्रतवो वाजिमेधाद्याः कृतास्तेन सदक्षिणाः।।18।।
जो गीता का पाठ और श्रवण हर रोज करता है उसने दक्षिणा के साथ अश्वमेध आदि यज्ञ किये ऐसा माना जाता है |(18)
गीताऽधीता च येनापि भक्तिभावेन चेतसा।
तेन वेदाश्च शास्त्राणि पुराणानि च सर्वशः।।19।।
जिसने भक्तिभाव से एकाग्र, चित्त से गीता का अध्ययन किया है उसने सर्व वेदों, शास्त्रों तथा पुराणों का अभ्यास किया है ऐसा माना जाता है |(19)
यः श्रृणोति च गीतार्थं कीर्तयेच्च स्वयं पुमान्।
श्रावयेच्च परार्थं वै स प्रयाति परं पदम्।।20।।
जो मनुष्य स्वयं गीता का अर्थ सुनता है, गाता है और परोपकार हेतु सुनाता है वह परम पद को प्राप्त होता है |(20)
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